भारतीय राजनीति : वक्त है बदलाव का...यूज होते ही थ्रो का वक्त आने वाला है...

 आम चुनाव में अभी गर्मी नहीं आई है। लेकिन आसमान से आग बरसनी शुरु हो गई है। पहाड़ खोदने वाले जंगल मिटाने वाले और नदियों की रेत पर डाका डालने वाले आग बबूला हो रहे हैं मौसम के मिजाज से घबरा रहे हैं। प्रकृति लगता है करवट बदल रही है। ऐसे में चुनाव में अक्सर लगने वाली कार्यकर्ताओं की टोलियां और ब्लाक मंडल स्तर के कार्यकर्ता भी नेताओं की बदलती तासीर से चिंतित हैं। आसमान से लेकर जमीन तक लगता है पूरा माहौल ही बदला हुआ है। जो दिख रहा है वह बहुत अच्छा नहीं है। मार्च में मई की तरह लू चल रही है। नदी तालाब कुए बावड़ियों की तरह सियासी दुनिया में काम कर रहे ठेकेदारों की आंख से भी शर्म का पानी सुखने लगा है।जनता और कार्यकर्ताओं के लिहाज से देखें तो पार्टियां और नेतागण कुछ भी कहें मगर उनके अच्छे दिन न कल थे और न कल आने वाले लगते हैं। लोकसभा चुनाव के लिए जो सीन दिख रहा है उसके मुताबिक मतदान तक कार्यकर्ता और उसके बाद वोटर यूज होते ही सियासी दलों द्वारा थ्रो कर दिए जाएंगे।
अब से कोई पांच दस साल पीछे जाएं तो चुनाव मतलब कार्यकर्ता और जनता के लिए उत्सव की तरह लगता था। मगर अब हालात बदल रहे हैं। ग्राम पंचायत, सामाजिक संगठन,मंडल और ब्लाक अध्यक्ष से लेकर जिला अध्यक्षों की पार्टी कार्यालयों में ऐसी आव भगत होती थी मानो वे शादी के मौके पर आए मेहमान हों। उम्मीदवार तो उन्हें बारातियों की तरह महत्व देते थे। अक्सर सरपंचों,जनपद और जिला सदस्यों की पूछ परख ऐसी होती थी मानो वे शादी वाले घर में लड़के के जीजा और फूफा हों। बारात के जाने से लेकर बहू के आने तक उन्हें सिर आंखों पर बैठाया जाता था। मान दान का मामला जो ठहरा।बारातियों और मतदान की तरह मान दानों की भी ससम्मान विदाई होती थी।साथ ही बड़े स्नेह के साथ दोबारा आने के लिए आमंत्रण भी दिया जाता था। सामाजिक सरोकार से जुड़ी ये सारी बातें पार्टियों के पदाधिकारी और उम्मीदवार चुनाव नतीजे आने के बाद भी अपने वादों को निभाते थे।
सियासत में सीन बदल रहा है। पांच साल पहले एक नारा चला था। अच्छे दिन आने वाले हैं। छह महिने पहले नारा चला, वक्त है बदलाव का। अब सच में वक्त बदल रहा है। राजनेताओं और कार्यालयों में कार्यकर्ताओं के बजाए इवेंट मैनेजर और एनजीओ से जुड़े लोगों की भीड़ है। पार्टियां अब कार्यकर्ताओं से नहीं पूछती किसको टिकट देना है। मतदाताओं के लिए पहचान पर्चियां भी अब नहीं बटवाई जाती। यह काम चुनाव आयोग के जरिए पार्टियों की सीमा से बाहर निकल गया है। सभाओं के इंतजाम में मंच माईक से लेकर कुर्सी लगने दरी बिछने और तंबू तानने के काम भी इवेंट मैनेजरों के जिम्मे हो गए हैं। जैसे पहले कभी शादी में परिवार और मोहल्ले के लोग भोजन बनाने से लेकर परसने तक का दायित्व उठाते थे अब वह काम टेंट वाले से लेकर शादी डाट काम वाले ही निपटा लेते हैं। ये जो वक्त बदल रहा है उससे इवेन्ट वालों के अच्छे दिन तो आ ही गए हैं। ब्लाक स्तर तक की समस्याओं के लिए एनजीओ में काम करने वाली टीम सारे डाटा इकट्ठे कर माननीयों को लैपटाप और पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन के जरिए बताते हैं। साथ ही वे ही समस्याओं के समाधान भी बताते हैं। कुर्ता पायजामा पहने लैपटाप का बैग लटकाए बढ़ी हुई दाढ़ी वाले मैट्रो सिटी से पढ़े हुए लड़के जब फर्राटे से अंग्रेजी बोलते हुए जब अपना प्रजेंटेशन करते हैं तो ऐसा लगता है मानो अब सब कुछ इन्ही के जरिए ठीक हो जाएगा। चुनाव भी जीत जाएंगे,सरकार भी बन जाएगी और मंत्री बनने के बाद यही शहरी नौजवानों की टीम अगले चुनाव तक समाधान का प्रजेंटेशन बनाएगी। अब इस बदलाव में सियासत का वो किरदार हाशिए पर चला गया जिसके लिए पैसा नहीं लीडर महत्वपूर्ण था। पद नहीं पार्टी उनके प्राण थी। अपना रसूख नहीं बल्कि जो उनके नेता हैं उनकी इज्जत बढ़े इसी के लिए वे दिन रात लगे रहते थे। यह सब भूखे प्यासे रहकर भी सिर्फ इसलिए सब काम करते थे ताकि उनकी पार्टी और लीडर जिन्दाबाद हो भले ही वे फकीरी में रहें। कार्यकर्ताओं की ऐसी जमात को अब भावुक,जिद्दी और जुनूनी माना जाता है। ऐसे लोगों को शरीफ लोगों की भाषा में बेवकूफ की बजाए सीधे कहा जाता है।
पार्टी और नेताओं के आसपास टेक्नोक्रेट और जेएनयू से पढ़े प्रतिभावान ऐसे बच्चों का समूह भी है जो समस्या बताता है और उनका शहरी अंदाज में समाधान भी। खास बातें यह है कि ग्राउंड जीरो पर जाकर समस्या के वास्तविक हल पर ज्यादा काम नहीं हो रहा है। इन दिनों भारतीय राजनीति में अजीब दौर चल रहा है। चुनाव भारत में और तरीके विदेशी लागू किए जा रहे हैं। अमेरिका की तर्ज पर फेसबुक,व्हाट्सअप और ट्विटर के जरिए प्रचार की टीम भारी भरकम करने के बाद लगाई गई है।रोजाना गांव और किसान से जुड़े मुद्दे एसी रूम में तय होते हैं और कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर पंख लगाकर उड़ने लगते हैं। इसके कुछ बड़े प्लेयर तो हफ्ते दस दिन में एक दो लाईन का मैटर सोशल मीडिया पर डालते हैं और उनकी टीम इसे करोड़ों लोगों के बीच ले जाती है। भारतीय मानस के साथ अजीब तरह का खेल चल रहा है। समस्या भी खुद ही बनाते हैं और समाधान भी खुद ही तय करते हैं। और गजब यह है कि समाधान को वे सौ फीसदी सही मान भी लेते हैं। मिसाल के तौर पर कालाधन आएगा तो हर आदमी के खाते में पन्द्रह लाख रुपए आएंगे। न काला धन आया न पन्द्रह लाख। मगर जुमला चलाने वालों ने अपना काम कर लिया। ऐसे ही किसानों के दो लाख तक के कर्जे माफ का नारा चला और हकीकत में जो काम दस दिन में होना था वह सौ दिन में भी नहीं हो पाया। ऐसे ही अब चल रहा है बेरोजगारों को हर साल 72 हजार रुपए देंगे। नारा है चल गया तो पार्टी सरकार में भले ही पन्द्रह लाख की तरह ये भी न मिले। यह आशंका इसलिए कि आखिर 25 करोड़ लोगों को हर साल 72 हजार रुपए देश कहां से लाएगा। विकास कार्यों का कितना हिस्सा इस तरह की घोषणाओं पर खर्च होगा और देश की शिक्षा उद्योग और रिसर्च पर इस घोषणा का कितना दुष्प्रभाव पड़ेगा। न कोई बताने वाला है। न कोई पूछने वाला और न कोई सुनने वाला। ये सब बातें वोट जुगाड़ने के लिए कार्यकर्ता के जरिए वोटर तक जाएंगी। मतदान तक कार्यकर्ता की थोड़ी पूछ परख और परिणाम के बाद वोटर और कार्यकर्ता दोनों अगले चुनाव तक के लिए सियासत से थ्रो कर दिए जाएंगे। अभी मतदान तक सबकी जय जय...   
ऐसई पूछा...
आखिर हमारे नेतागण ऐसा कौन सा धंधा करते हैं कि पांच साल में उनकी संपत्ति बिना कुछ किए ही सौ गुना से ज्यादा बढ़ जाती है। जबकि नेता लोग चौबीस घंटे बारह महीने 365 दिन सिर्फ राजनीति करते हैं तो वे पैसा कहां से कमाते हैं। बेईमान तो वे हैं नहीं उनके ईमान पर कोई शक भी नहीं है लेकिन देश की जनता को वे उस अलादीन के चिराग का कुछ अंश कार्यकर्ता और जनता के लिए भी मुहैया करा दें ताकि उनकी मुफलिसी दूर हो जाए।इंतजार है कोई बड़े दिल का नेता इस काम को शायद कर जाए...   
राघवेंद्र सिंह    
(लेखक IND24 समूह के प्रबंध संपादक हैं)