मध्यप्रदेश : सियासी अखाड़े में तेल लगाकर उतरने का रिवाज

लोकसभा चुनाव के चलते सूबे की सियासत का पारा धीरे धीरे ही सही चढ़ रहा है। इसमें उछाल आया मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस के चमकदार चेहरों में शामिल ज्योतिरादित्य सिंधिया के दिग्विजय सिंह को लेकर एक बयान से। दरअसल इन दोनों नेताओं ने कहा है कि जो कठिन लोकसभा का क्षेत्र है वहां से दिग्विजय सिंह को चुनाव लड़ना चाहिए। इस पर जवाब भी आ गया है। दिग्विजय कहते हैं पहले पार्टी तय तो कर ले उन्हें कहां से लड़ाना है। जो आदेश होगा वहां से वे मैदान में उतर जाएंगे। अब यहां से कांग्रेस के नेताओं में एक दूसरे को चित करने के लिए धोबी पछाड़ जैसे दाव लगाने का खेल शुरू होता है। लेकिन सियासत के जानकार मानते हैं कि पार्टी कोई भी हो उनके बड़े लीडर राजनीति के अखाड़े में इतना तेल लगाकर तो उतरते ही हैं कि वे किसी की पकड़ में न आने पाए। चित भले ही न करें मगर खुद के भी चीं बोलने की नौबत न आए। कांग्रेस में लीडर क्षेत्र बदलने को तैयार नहीं होते और भाजपा में एक ही क्षेत्र से दोबारा लड़ने को नेताओं का मन कम करता है। यही अंतर दोनों दलों को गंगा जमुना के पानी की तरह अलग भी दिखाता है। सियासत के जानकार और भले मानुष इस फर्क को अपने अपने तरीके और चश्मों के हिसाब से देख सकते हैं।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में लाने का जो सपना दिग्विजय सिंह ने देखा होगा उसे उन्होंने मन वचन और कर्म के हिसाब से नर्मदा परिक्रमा पूरी करने के साथ फली भूत होने के संकेत दे दिए थे। अक्सर कहा जाता है और मान्यता भी है कि नर्मदा परिक्रमा शुध्द मन से की जाए तो मनोकामनाएं पूरी होती हैं। एक और बात है नर्मदा परिक्रमा में अगर सियासत होती है तो ऐसे लोगों का पतन होते भी देखा गया है। विधानसभा चुनाव के छह माह पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने कमलनाथ को लेकर आमधारणा थी कि पार्टी को बहुमत मिला तो नाथ ही मुख्यमंत्री होंगे। कांग्रेस को सत्ता के निकट लाने में जाहिर है उनके छह महिने का अध्यक्षीय कार्यकाल महत्वपूर्ण तो था मगर पर्याप्त नहीं था। योजना तो बहुत अच्छी बन सकती है पर उस पर अमल कराने वाले और उसकी टीम ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। कांग्रेस की तासीर है कि उसमें ग्राम पंचायत से लेकर हाईकमान तक गलाकाट गुटबाजी रहती है। एक बार दिग्विजय सिंह ने कहा था कांग्रेस को केवल कांग्रेस ही हरा सकती है। शायद इसलिए उन्होंने नर्मदा परिक्रमा कर गांव गांव में कांग्रेस की उपस्थिति दर्ज कराई और अपने दस साल के शासनकाल में जाने अनजाने हुए पापों का प्रायश्चित भी किया। इसके बाद समन्वय समिति के अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस में  चुनावी बारात में लड़की के पिता की भूमिका में आ गए। उन्होंने कहा टिकट किसी को भी मिले पंजे को जिताना है। असल में पन्द्रह साल से वनवास भोग रही कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं के मन की बात दिग्विजय सिंह कर रहे थे। नतीजे के तौर पर कांग्रेस की सरकार बनी। जाहिर है इसमें कार्यकर्ता, कमलनाथ,सिंधिया के पराक्रम को श्रेय जाता है। सत्ता में आने के बाद कुछ मौके ऐसे भी आए जब दिग्विजय सिंह की भूमिका एक बड़े पावर सेन्टर के रूप में दिखलाई दी। जितनी भीड़ सीएम के आस पास नहीं होती शायद उससे ज्यादा लोग दिग्विजय से मिलने आते हैं। अब यहीं से शुरू हो सकती है दिग्विजय और कमलनाथ के बीच पावर गेम का संघर्ष और कानाफूंसी। हालांकि दोनों नेताओं की परिपक्वता को देखते हुए मतभेद या दूरी की कल्पना करना अभी उचित नहीं होगा।
दिग्विजय - कमलनाथ राजनीति में छोटे और बड़े भाई रिश्ते को निभाते आ रहे हैं। हमारी समझ से दोनों घुटे हुए नेता हैं। अगर कमलनाथ ने ये कहा है कि दिग्विजय सिंह को ऐसी संसदीय सीट से लड़ना चाहिए जो भाजपा की परंपरागत सीट बन गई हैं। अब इसी लाइन पर सिंधिया का बयान आता है। ऐसा लगता है कांग्रेस के भीतर सिंधिया,दिग्विजय-कमलनाथ के चक्रव्यूह में फंसते या यूं कहें घुसते नजर आ रहे हैं। बहुत संभव है कांग्रेस के ये छोटे भाई बड़े भाई की टीम सिंधिया महाराज को गुना, ग्वालियर की बजाए कठिन सीट के फार्मूले पर इंदौर या उज्जैन से मैदान में उतारने के शगूफे शुरू कर सकती है। यद्पि सिंधिया के पास उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी भी है और यह उन्हें कठिन की बजाए सुविधाजनक सीट पर ही चुनाव लड़ाने के रास्ते खोलती है। एक बात और है इस स्तर के तमाम बड़े लीडर पकड़ में इसलिए भी कम आते हैं क्योंकि वे सियासी अखाड़े में तेल लगाकर उतरते हैं। इस वजह से जनता कार्यकर्ता और जिलों के लीडर भी उनसे मर्जी के खिलाफ काम नहीं करा पाते।
भाजपा में कांग्रेस की तुलना में थोड़ा अगल सीन है। यहां कठिन सीट से भी लड़ते हैं और सीटें बदलते भी हैं। जहां तक कठिन का मामला है 2003 के विधानसभा चुनाव में राघोगढ़ से दिग्विजय के खिलाफ भाजपा के शिवराज सिंह चौहान मैदान में थे। जबकि उनकी सीट बुदनी विधानसभा रही है। इसके अलावा शिवराज एक बार बुदनी के साथ विदिशा विधानसभा सीट से भी चुनाव जीत चुके हैं। सीटें बदलने के मामले में अटलजी ग्वालियर से लखनऊ,उमा भारती खजुराहो,भोपाल और झांसी, मुरलीमनोहर जोशी वाराणसी से कानपुर, हरियाणा की सुषमा स्वराज दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने के बाद भी सोनिया गांधी के खिलाफ कर्नाटक से चुनाव लड़ी और फिर अब दो बार से विदिशा से सांसद हैं। ऐसे ही प्रहलाद पटेल छिन्दवाड़ा,बालाघाट में लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद दमोह से सांसद हैं। नरेन्द्र सिंह तोमर मुरेना के बाद अब ग्वालियर से सांसद हैं। कैलाश विजयवर्गीय इंदौर दो नंबर से महू विधायक बने तो ताजा उदाहरण ऊषा ठाकुर इंदौर तीन से महू जाकर चुनाव जीतीं। भाजपा में ऐसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। अब इस सियासी फितरत के दो मायने हैं। एक तो ये कि भाजपा नेता साहसी होने के साथ इतने लोकप्रिय हैं कि कहीं से भी चुनाव लड़कर जीतने का माद्दा रखते हैं। दूसरा यह कि एक क्षेत्र में वे दोबारा इसलिए भी चुनाव नहीं लड़ना चाहते कि पांच साल में ही वे कार्यकर्ताओं के बीच अलोकप्रिय हो जाते हैं और जनता का विश्वास खोने लगते हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता मेहनत करके अपना क्षेत्र बनाते हैं। दिन रात भले ही न हो मौके बेमौके कार्यकर्ताओं के काम आते हैं। जनता को गुड़ भले ही न दें लेकिन गुड़ जैसी बात करते हैं। सियासत के जानकार इन मुद्दों को भी अपनी विचारधारा और चश्में के रंग के हिसाब से समझ सकते हैं। हमारा तो इतना कहना है राजनीति के अखाड़े में बड़े पहलवानों को पटकनी देना कठिन होता है क्योंकि कुश्ती का उसूल है खूब तेल लगाकर निकलो ताकि पकड़ने वाले कितने भी चतुर हों उनके हाथ से सटक जाओ। अभी तो देखना है कौन कितना तेल लगाकर निकल रहा है और कार्यकर्ता और जनता में कितना तेल लगा रहा है। सियासत को ओढ़ने बिछाने वालों के लिए एक बात बड़ी मौजूं लगती है – खाने में कोई जहर घोल दे तो एक बार उसका इलाज है, लेकिन कान में कोई जहर घोल दे तो उसका कोई इलाज नहीं है। काम करने वाले और कान भरने वालों में जो फर्क करेगा उसकी कामयाबी के आसार ज्यादा हैं।
राघवेंद्र सिंह
(लेखक IND24 न्यूज चैनल समूह के प्रबंध संपादक हैं)