फैज की नज़्म हिंदू विरोधी ? जावेद अख्तर बोले - यह बेहद बेतुका और फनी

कानपुर।आईआईटी कानपुर में उर्दू के मशहूर शायर फैज अहमद फैज की कविता 'हम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे' पर बढ़ते विवाद को गीतकार-लेखक जावेद अख्तर ने बेतुका बताया है। जावेद अख्तर ने कहा कि फैज की किसी बात को या उनके शेर को हिंदू विरोधी कहा जाए, यह इतना फनी है कि इस पर सीरियस होकर बात करना मुश्किल है। फैज ने यह नज्म पाकिस्तान में जिया-उल-हक की सरकार के खिलाफ लिखी थी।
बता दें कि पिछले दिनों आईआईटी कानपुर में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ छात्रों ने जुलूस निकाला था जिसमें फैज की नज्म की चंद लाइनें गायी गई थीं। इसके बाद कैंपस के कुछ छात्रों और फैकल्टी सदस्यों ने इसका विरोध करते हुए गीत को हिंदू विरोधी बता दिया था।
जावेद अख्तर ने फैज की कविता को हिंदू विरोधी बताए जाने पर कहा, 'फैज की किसी बात को या उसके शेर को ऐंटी हिंदू कहा जाए, यह इतना अब्सर्ड (बेतुका) और फनी है कि इस पर सीरियसली बात करना थोड़ा मुश्किल होगा। फैज अहमद फैज अविभाजित हिंदुस्तान में प्रोग्रेसिव राइटर्स (प्रगतिशील लेखक) का जो मूवमेंट हुआ था उसके लीडिंग स्टार (अग्रणी) थे। हिंदुस्तान में आजादी तो आई लेकिन साथ में पार्टिशन भी हुआ। लाखों लोग बेघर हुए, मरे, यहां से वहां आबादी गई।'
जावेद अख्तर आगे कहते हैं, 'फैज ने उस समय नज्म क्या लिखी थी, ''ये दाग दाग उजाला ये शब-गज़ीदा सहर', यानी वह सुबह जिसे रात ने डस लिया, यह सुबह तो है लेकिन इसे रात ने डस लिया है। यानी आजादी मिली तो विभाजन भी हुआ। 'वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं. ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर' जिस आदमी ने यह दुख जताया था कि इस मुल्क के टुकड़े कैसे हो गए, उस पर कविता लिखी थी, उसके बारे में ऐसी बात करना परे है।'
जावेद अख्तर ने आगे कहा, 'वह आदमी जिसकी जिंदगी के जितने बरस पाकिस्तान के है उनमें से आधे बरस तो मुल्क से बाहर गुजारे, क्योंकि वह उस मुल्क में रह नहीं सकता था, उन्हें ऐंटी पाकिस्तान बुलाने लगे थे।' जावेद अख्तर ने आगे कहा, 'आजकल यहां ऐंटी इंडिया कहते हैं न जहां आपने फंडामेंटलिज्म (कट्टरवाद) के खिलाफ बात की। जहां आपने तंग नजरी और नफरत की बात की तो कहते हैं कि आप देश के खिलाफ हो। वही उसके साथ भी हुआ, वह आधे समय तो पाकिस्तान से बाहर रहा और यह गीत जिसका जिक्र आजकल हो रहा है, जियाउल हक की सरकार के खिलाफ लिखी थी जो कि फिर वही कम्युनल (सांप्रदायिक), रिग्रेसिव और फंडामेंटलिस्ट था यानी जो पाकिस्तान में भी रिग्रेसिव कहलाए, फंडामेंटलिस्ट कहलाए वो कितना फंडामेंटलिस्ट होगा आप सोचिए।'
बता दें कि बता दें कि जामिया कैंपस में पुलिस कार्रवाई के बाद छात्रों से एकजुटता जाहिर करने के लिए आईआईटी कानपुर के छात्रों ने कैंपस में जुलूस निकाला था जिसमें फैज अहमद फैज की यह कविता गाई थी। इसके बाद आईआईटी के एक शिक्षक और कुछ स्टूडेंट्स ने इस पर आपत्ति जताते हुए डायरेक्टर से शिकायत की। इसके बाद डायरेक्टर की ओर से शिक्षकों की जांच कमिटी बनाई गई थी। बताया जा रहा है कि तीन विषयों पर जांच चल रही है, पहला दफा 144 तोड़कर जुलूस निकालना, दूसरा सोशल मीडिया पर छात्रों की पोस्ट और तीसरा फैज अहमद फैज की नज्म हिंदू विरोधी है या नहीं?
फैज की जिस कविता पर हुआ बवाल
हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

इस पंक्ति पर हुआ बवाल
नज्म पर सवाल उठाने वाले लाइन 'सब तख़्त गिराए जाएंगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का, जो गाएब भी है हाजिर भी' पर ऐतराज जता रहे हैं। बता दें कि यह कविता फैज ने 1979 में सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक के संदर्भ में लिखी थी और पाकिस्तान में सैन्य शासन के विरोध में लिखी थी। फैज अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण जाने जाते थे और इसी कारण वे कई वर्षों तक जेल में रहे।
गौरतलब है कि आईआईटी-के के छात्रों ने जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के समर्थन में 17 दिसंबर को परिसर में शांतिमार्च निकाला था और मार्च के दौरान उन्होंने फैज की यह कविता गाई थी।