राष्ट्रवाद के नाम पर छलावों की राजनीति और गुमराह लोकतंत्र

आज, जब हम 2020 के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, बीसवीं सदी के तीसरे दशक की दहलीज पर पहला कदम ऱखने के पहले ही देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के विकास-दृष्टिपत्र विजन-2020 की इबारत दिलो-दिमाग को कुरेदने लगती है, जिसमें उन्होंने भारत को एक विकसित राष्ट्र में बदलने का सपना देखा था। डॉ. कलाम को भरोसा था कि देश के साठ करोड़ युवाओं के बलबूते देश के 26 करोड़ लोगों को गरीबी से मुक्त कराने, हर चेहरे पर मुस्कान लाने और भारत को पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को हर हाल में हासिल किया जा सकता है। डॉ. कलाम मानते थे कि ये लक्ष्य पूरे हो सकते हैं, बशर्ते हमारे प्रयासो में ईमानदारी हो। भारत के मौजूदा परिदृश्य में डॉ. कलाम द्वारा अपेक्षित राजनीतिक ईमानदारी धुंआ बन चुकी है। डॉ. कलाम के विजन-2020 की अवधारणा को विकास का एक खूबसूरत भावुक सपना मानकर खारिज नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इसे तैयार करने में उन्होंने 500 से ज्यादा विशेषज्ञों की मदद ली थी। व्यावहारिकता के धरातल पर यह एक खरा डॉक्यूमेंट था।  
डॉ. कलाम की जिद थी कि 2020 में भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सवाल यह है कि ऐसा क्यों नहीं हो सका? इसका जवाब बीते दशक की राजनीतिक गाथा में छिपा है।  देश की इकॉनामी को पांच ट्रिलियन डॉलर की समर्थ आर्थिकी में बदलने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती दौर में अपने भाषणों में अक्सर इस बात का जिक्र करना नहीं भूलते थे कि ’वो आजाद भारत में पैदा हुए देश के पहले प्रधानमंत्री हैं’। उनके इस कथन के साथ ही उनका यह आव्हान भी पूरी मार्मिकता और उसमें निहित उत्सर्ग की भावनाओं के साथ लोगों के जहन में दर्ज होता रहा है कि ’हमें भले ही देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने का अवसर नहीं मिल सका हो, लेकिन हम देश के लिए जी सकें, यह अवसर जरूर मिला है’। उनके भाषणों के इन उद्धरणों में हम जैसे लाखों लोगों को गुदगुदाने वाला भाव-तत्व मौजूद है, जिन्होंने आजादी की पौ फटने के बाद खुली हवाओं में पहली सांस ली थी और उसमें देश की माटी की महक को महसूस किया था।
बहरहाल, मोदी की सल्तनत में छह साल गुजारने के बाद अब यह महसूस होने लगा है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह शब्दावली राष्ट्रवाद के नाम पर गुमराह करने के लिए राजनीतिक-छलावों से उत्प्रेरित थी। मोदी के शब्दों में उम्मीदों की जो बाती टिमटिमाती थी, उसे तूफानों ने निगल लिया है। आसपास जो कुछ नजर आ रहा है, वह इत्मीनान पैदा करने वाला नहीं है, क्योंकि जिंदगी के इर्दगिर्द अंधेरों का घेरा कसता जा रहा है। ’सबके साथ सबके विकास’ की कहानी के साथ मोदी के राजनीतिक-उद्भव का जो सिलसिला 2014 में शुरू हुआ था, उसकी इबारत में तेजाब घुल चुका है। विकास की लहर में सांप्रदायिकता के जहर ने घातक आयाम अख्तियार कर लिए हैं। लोकतंत्र के तटबंधों पर हर दिन होने वाले जहरीले आघात संविधान के मूल्यों को छिन्न-भिन्न करने पर उतारू हैं। भारत का संविधान भले ही कुछ भी कहे, लेकिन इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट की ओर से जनवरी 2019 में प्रकाशित ग्लोबल डेमोक्रेसी इंडेक्स 2018 के मुताबिक भारत मे लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का ढांचा चरमराने लगा है। यह इंडेक्स पांच श्रेणियों में साठ मानदंडों की कसौटियों पर 167 देशों में लोकतंत्र की रैंकिग तय करता है। चुनावी प्रक्रिया और बहुलतावाद, सरकार का कामकाज, राजनैतिक भागीदारी, लोकतांत्रिक राजनैतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता के पैमानों पर भारत के लोकतंत्र में हिंसा घुलने लगी है। इस सूची में भारत को 41वां स्थान मिला है, जिसके मायने यह हैं कि दुनिया की नजरों में भारत एक त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र है। मानव अधिकारों के मामले में भारत का दर्जा निरन्तर नीचे गिर रहा है। यूपीए सरकार के दस सालों के दरम्यान गरीबों को काम करने का अधिकार, सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार देने जैसे जो मानवीय उपाय लागू किए थे, वो सभी किसी न किसी रूप में मोदी-सरकार की अमीर-परस्त नीतियों की बलि चढ़ चुके हैं।
देश एक अनचाहे, अदृश्य और अनचीन्हे विभाजन की ओर बढ़ रहा है। मोदी-सरकार की नीतियों में ज्वलनशीलता का तत्व चिंता पैदा करने वाला है। हिन्दू-मुसलमान की बुनियाद पर भारतीय गणतंत्र के मूल चरित्र को बदलने वाली नीतियों की ज्वलनशीलता से यह देश कितना आहत होगा, यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। आशंकाओं के बीच यह सवाल शोर करने लगता है कि बकौल मोदी आजादी के बाद वाली पीढ़ी को देश के लिए जीने का जो अवसर मिला है, उसके मायने क्या यही हैं कि लोकतंत्र को लपटों के हवाले कर दिया जाए? यह सवाल मौजूं है कि आने वाला दशक क्या टकराव और विवाद का दशक होगा अथवा एक समन्वयकारी संवैधानिक व्यवस्था के तहत देश आगे बढ़ेगा?
- उमेश त्रिवेदी
- लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।