मध्यप्रदेश : सियासी पिच पर टी-20 जैसा खेलेंगे भाजपा-कांग्रेस

देह को कंपा देने वाली ठंड की मार और राजधानी भोपाल में पचमढ़ी से भी अधिक ठंडी रात गुजारने के बीच पूरे प्रदेश में जश्‍न के साथ नये साल का स्वागत प्रदेशवासियों ने किया। नये साल की खुशियों में तल्लीन लोगों को पहले दिन ही केन्द्र सरकार ने मंहगाई का तड़का लगाकर इस खुशी के माहौल का मजा कुछ फीका कर दिया। रेलवे के साधारण से लेकर एसी तक सभी श्रेणियों का किराया तो बढ़ाया ही गया साथ ही गैस सिलेंडर के दामों में भी बढ़ोत्तरी के साथ मंहगाई का तड़का केन्द्र सरकार ने लगा दिया है। नया साल मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के लिए चुनौतियों से भरा होगा और दोनों को अपने संगठन को चुस्त-दुरुस्त कर आने वाले विधानसभा के जौरा उपचुनाव एवं नगरपालिका, नगर निगमों सहित शहरी निकाय चुनावों में अपनी वास्तविक मैदानी पकड़ का अहसास कराना होगा। इसके लिए दोनों ही दलों को यदि क्रिकेट की भाषा में कहें तो वर्ष 2020 में टी-20 के मैच जैसी चपलता, सक्रियता और एकाग्रता दिखाना होगी और जो भी दल इसमें बाजी मार लेगा वह इस साल प्रादेशिक राजनीतिक फलक पर मुकद्दर का सिकंदर साबित होगा। दोनों ही दलों को इस साल में अपने नये मुखिया की दरकार होगी और जो चेहरे सामने आयेंगे उन्हें देखने के बाद ही इस बात का पता चलेगा कि कौन अधिक ऊर्जावान एवं अपने संगठन के लिए मुफीद साबित होगा। जहां तक कांग्रेस का सवाल है चूंकि राज्य में उसकी सरकार है और मुखिया कमलनाथ हैं ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के चयन में यदि कुछ कमी रह जाती है तो उसकी भरपाई वे कर देंगे क्योंकि जहां सरकार होती है वहां प्रदेश अध्यक्ष की तुलना में मुख्यमंत्री का किरदार ज्यादा अहमियत रखता है। भाजपा को चेहरे के चयन में अधिक सतर्कता बरतनी होगी क्योंकि उसे एक ऐसा चेहरा खोजना होगा जो सबको साथ लेकर चल सके और कांग्रेस की सत्ता व संगठन की मिलीजुली ताकत का मुकाबला कर सके।
जौरा विधानसभा उपचुनाव जो इसी साल होना है उसमें जीत हासिल करना मुख्यमंत्री कमलनाथ की तुलना में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा से अधिक जुड़ा रहेगा, क्योंकि यह इलाका उनके असर वाला है और प्रत्याशी का चयन भी उनकी सलाह से होने की अधिक संभावना है। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जौरा सीट पर जीत दर्ज कराई थी और उसे अपनी इस सीट पर फिर से कब्जा जमाये रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा क्योंकि यह विधानसभा क्षेत्र केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के संसदीय क्षेत्र के अन्तर्गत आता है इसलिए यह सीट कांग्रेस से छीनने के लिए भाजपा के साथ ही वे भी अपनी पूरी ताकत लगायेंगे। जहां तक नगरपालिका, नगर निगमों सहित शहरी निकाय के चुनावों का सवाल है उसमें कांग्रेस के लिए खोने को कुछ नहीं है बल्कि पाने की अनन्त संभावनाएं हैं क्योंकि इनमें अभी भाजपा की पकड़ कांग्रेस की तुलना में काफी मजबूत रही है। भाजपा के सामने बड़ी चुनौती यह रहेगी कि वह अपने जीते हुए निकायों में से अधिकांश में अपनी पकड़ बनाये रखे अन्यथा इसका संदेश यही जायेगा कि भाजपा की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है। कांग्रेस इन चुनावों में जितना भी आगे बढ़ेगी वह उसके लिए सफलता ही मानी जायेगी, क्योंकि नगर निगमों और बड़ी नगरपालिकाओं में से अधिकांश पर भाजपा ही काबिज है। कमलनाथ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते पार्टी ने जो वचनपत्र प्रदेश में जारी किया था उसमें राज्य में विधान परिषद गठन करने का एक अहम् वायदा भी शामिल था। पूर्व में भी कांग्रेस विधानसभा चुनाव के पूर्व दो-तीन मर्तबा इस प्रकार का वायदा कर चुकी थी लेकिन वह पूरा नहीं हुआ और देखने वाली बात अब यही रहेगी कि कमलनाथ इस वायदे की पूर्ति की दिशा में इस वर्ष कितने कदम आगे बढ़ाते हैं।
कमलनाथ ने दृढ़ राजनीतिक व प्रशासनिक क्षमता का परिचय देते हुए बीते साल प्रदेश को सभी प्रकार के माफियाओं से मुक्त करने का जो अभियान छेड़ा उसकी असली परीक्षा अब इस साल होगी। यह अभियान कितना सफल रहता है और प्रदेशवासियों को माफियाओं के चंगुल से मुक्त होने में कितनी वास्तविक राहत मिलती है इसका आंकलन साल के जाते-जाते ही हो सकेगा। स्वयं कमलनाथ को इस बात की सतर्कता बरतनी होगी कि यह अभियान छुटपुट अतिक्रमण हटाओ अभियान बनकर न रह जाये और विभिन्न क्षेत्र के माफियाओं से मुक्ति की जो पहल हुई है वह रस्म अदायगी बनकर न रह जाये। उनकी इस मामले में सतर्कता इसलिए जरुरी होगी क्योंकि इस प्रकार के गोरखधंधों में लगे लोग काफी रसूखदार होते हैं और उनकी पहुंच सत्ताधारी तथा विपक्षी दल दोनों तक रहती है साथ ही प्रशासनिक अमले तक भी उनकी मिलीभगत होती है। मुख्यमंत्री के इस अभियान को यह सब मिलकर कहीं पलीता न लगा पायें इसकी पुख्ता व्यवस्था एवं सतत् निगरानी करनी होगी। कमलनाथ ने नववर्ष का शुभारंभ इस आशा व विश्‍वास के साथ किया कि समय की कीमत समझें और उसके साथ चलें तथा हर पल नया सीखने के लिए तैयार रहें और विफलताओं से सीखने के लिए तो हमेशा ही तैयार रहें। वे मानते हैं कि असफलतायें कुछ नहीं बल्कि आधे-अधूरे मन से किए गए प्रयासों का फल होती हैं। वे शायद अल्ताफ हुसैन हाली का नायाब शेर याद करते हैं जिसमें शायर ने कहा है कि- “है जुस्तजू कि खूब से है खूबसूरत कहां ?, अब ठहरती है देखिए जाकर नजर कहां।“ कमलनाथ कहते हैं कि जो समय के साथ दोस्त करते हैं वे अंतत: अपनी मनचाही मंजिलों को पा लेते हैं।
भाजपा के सामने चुनावों से जूझने की चुनौती
विपक्षी दल की भूमिका में नया साल भाजपा के लिए सम्भावनाओं से भरा हुआ है बशर्ते कि नई टीम नई ऊर्जा के साथ प्रदेश में सक्रिय हो, क्योंकि 2020 का पूरा साल चुनावों से भरा होगा। इसमें सफलता पाने के लिए उसे नये जोश-खरोश के साथ मैदान में उतरना होगा। फिलहाल पार्टी की कमान राकेश सिंह के हाथ में है और यदि सब ठीक चलता रहा और अन्त में जैसा कि भाजपा में होता आया है प्रदेश अध्यक्ष के चयन में बकौल प्रभात झा कभी-कभी पोखरण विस्फोट भी हो जाता है, यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर कमान उनके ही हाथों में रहने की अधिक संभावना है। पन्द्रह साल से प्रदेश का भाजपा संगठन एक प्रकार से सत्ता आश्रित हो गया है और इस पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मजबूत पकड़ है। अब पार्टी चूंकि विपक्ष में है इसलिए संगठन के दम पर ही उसे अपनी पकड़ मजबूत करना होगी। वह भी ऐसी जो कांग्रेस के सामने उन्नीस नहीं बल्कि बीस साबित हो। विधानसभा चुनाव में महीन से अन्तर से सत्ता गंवा बैठी भाजपा के लिए इस साल फिर एक नया मौका मिलने वाला है। जौरा विधानसभा उपचुनाव होना है और राज्यसभा की तीन सीटों के लिए भी इसी साल निर्वाचन होना है। इनमें से दो सीटें अभी भाजपा के पास हैं, लेकिन अब दोनों पर कब्जा बरकरार रखना भाजपा के लिए आंकड़ों के हिसाब से लोहे के चने चबाने जैसा होगा, क्योंकि आंकड़ों का गणित कांग्रेस के पक्ष में है तथा निर्दलियों सहित सपा-बसपा के समर्थन के कारण कांग्रेस दो सीटों पर मजबूत स्थिति में है। ऐसे में जोड़तोड़ की राजनीति में सिद्धहस्त हो चुकी भाजपा के लिए यह बड़ी चुनौती होगी कि वह अपनी दोनों सीटें कैसे बचा पाती है।
और यह भी...
बीते साल केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए बनाया था और उसको लेकर जो देशव्यापी विरोध हो रहा है उसके चलते अब भाजपा नये साल के पहले महीने में अपनी पूरी ताकत झोंकने वाली है। मध्यप्रदेश के दो नेताओं पूर्व मंत्री विधायक डॉ. नरोत्तम मिश्रा को छत्तीसगढ़ एवं महाराष्ट्र की जिम्मेदारी सौंपी गयी है जहां वे इस अभियान को गति देने के लिए बतौर प्रभारी सक्रिय रहेंगे तो वहीं विधायक अरविन्द भदौरिया उत्तरप्रदेश एवं हरियाणा में सक्रिय रहकर रणनीति तैयार करेंगे। डॉ. मिश्रा को मिली जिम्मेदारी अपेक्षाकृत अधिक चुनौतीपूर्ण है क्योंकि दोनों ही राज्यों में भाजपा विपक्ष में है और महाराष्ट्र में उसका मुकाबला लम्बे समय तक सहयोगी रही शिवसेना से है, जिसमें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के सहयोग से सरकार बना ली जबकि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भाजपा सरकारें हैं और वहां परिस्थितियां अनुकूल हैं। इस माह 12 जनवरी को जबलपुर में अमित शाह आयेंगे तो राजधानी भोपाल में योगी आदित्यनाथ की रैली होगी भी किसी दिन होगी। नये साल के आगाज के साथ ही भाजपा रैली-सभा-सम्मेलन और पत्रकार वार्ताओं के जरिए जनजागरण के अभियान की शुरुआत कर चुकी है।
- अरुण पटेल