कोरोना वायरस : कफस में बहुत महफूज हैं हम...

एक फिल्मी गाने के बोल हैं, 'कफस (पिजड़ा या कैद) में हम बहुत महफूज (सुरक्षित) होंगे, कि पहरे पर खड़ा सैय्याद (शिकारी) होगा।' इस रविवार चौदह घंटे के लिए अपने घर को कफस यानी कैद समझने का यह अहसास वाकई मन में इस बात को पक्का कर गया कि हम सपरिवार महफूज रहने की दिशा में एक अहम कदम बढ़ा चुके हैं। कोरोना वायरस से लड़ने की दिशा में आम जनता की विराट सामूहिक भागीदारी वाला ऐसा महायज्ञ शायद भारत में ही संभव था। जनता कफर््यू एक ऐसे भाव को मन के भीतर जगा गया, जिसने 'कोरोना का रोना' भूलकर सुरक्षा के इस यकीन को पुख्ता कर दिया। इस चौदह घंटे में पल-भर के लिए भी नहीं लगा कि मामला किसी बाध्यता का है। बल्कि भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच अरसे बाद वह लम्हा मिला, जब इस छुट्टी का पूरा का पूरा दिन केवल और केवल परिवार के बीच बिता सका। यह सब आपसी साथ के सुख का वह मामला रहा, जिसकी यादें शायद हमेशा सुखद अहसास को जिलाये रखेगी।
 यूं तो मोबाइल फोन साथ था। व्हॉट्सएप की धडकनों पर कोई रोक नहीं थी। बातचीत के टेलिफोनिक तमाम विकल्प बाकी दिनों की ही तरह खुले हुए थे। पड़ोसी से बात करने का सिलसिला भी बेधड़क कायम रखा जा सकता था। यह डर भी नहीं था कि घर से बाहर कदम रखने पर किसी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ जाएगा। लेकिन सच कहूं तो संपर्क के ऐसे किसी माध्यम को इस्तेमाल करने की कम से कम मजबूरी तो महसूस नहीं ही हुई। सुबह सात बजने से पहले ही सारे परिवार ने स्वेच्छा से खुद पर एक रोक लगा ली। सात बजने के बाद मन बाहर के जगत से खुद ब खुद दूर हो गया। अखबार पढ़ते-पढ़ते परिवार के बीच एक ही बात थी, कोरोना। एक ही खयाल था, इससे बचाव। एक ही भावना थी, इससे बचने के लिए जनता कफर््यू का अपने तई ईमानदारी से पालन। मीडिया का वाकई बड़ा आभार कि आज कागजों सहित टीवी की स्क्रीन पर भी इस वायरस की विभीषिका का इतना सशक्त प्रकाशन/ प्रसारण किया गया कि परिवार का हरेक सदस्य मुतमईन रहा कि चौदह घंटे के इस सामूहिक कर्तव्य में ही सबका भला छिपा हुआ है।
परिवार का वातावरण देखकर और आसपास के माहौल की जानकारी मिलने के बाद एक अलग किस्म का संतोष भी मिला। वह यह कि जनता कफर््यू के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के राजनीतिकरण की कोशिशों को बहुत अधिक कामयाबी नहीं मिली है। उन कमअक्लों की कोई फैन फालोइंग नहीं बन सकी है, जो यह कहते हुए नहीं थक रहे थे कि मोदी ऐसा करके किसी राजनीतिक लाभ को पाने का जतन कर रहे हैं। शाम पांच बजे तालियों सहित शंख, घंटी और थालियों को बजाये जाने का जो सामूहिक स्वर सुनाई दिया, उसने उन सभी लोगों के प्रति श्रद्धा से भर दिया, जो इन हालात में भी घर से बाहर किसी अस्पताल से लेकर बाजार या अन्य संस्थान में अपने-अपने कर्तव्य को अंजाम दे रहे हैं।
आज राजनीति की बात करने का ज्यादा मन नहीं हो रहा। इसलिए फौरी तौर पर कुछ बात ही रख रहा हूं। सवाल यह कि प्रदेश भाजपा विधायक दल का नया नेता कौन बनेगा। नरेंद्र सिंह तोमर, शिवराज सिंह चौहान, नरोत्तम मिश्रा या गोपाल भार्गव। एक सवाल यह भी कि संभावित सरकार में मंत्रियों के बीच संतुलन किस तरह कायम रखा जा सकेगा। जाहिर है कि भाजपा के पूर्व मंत्रियों की आशाएं फिर जवान हो गयी हैं, लेकिन उम्मीद से तो वे भी होंगे, जिन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थन में विधायक दल से इस्तीफा देकर भाजपा के लिए सत्ता का बहुत बड़ा मार्ग प्रशस्त किया है। निश्चित ही मंत्री बनने के लिए उनका फिर से विधायक बनना जरूरी होगा, लेकिन यह विकल्प भी तो मौजूद है कि किसी भी गैर विधायक को मंत्री बनाकर छह महीने के भीतर-भीतर उसे विधानसभा चुनाव जीतने का मौका दिया जा सकता है। सिंधिया समर्थक विधायक उपचुनाव का इंतजार शायद ही कर सकें। जाहिर है कि ऐसा करके भाजपा उन्हें नाराज भी करना नहीं चाहेगी। कांग्रेस ने कल ही ट्वीट करके दावा किया है कि 15 अगस्त, 2020 को कमलनाथ ही लाल परेड मैदान पर तिरंगा फहरायेंगे। हालांकि यह बहुत कठिन और कांग्रेस के लिए बहुत मेहनत भरा है, जिसकी उसे आदत रही नहीं है। जाहिर है कि  पार्टी का इशारा 24 सीटों पर होने वाले उस उपचुनाव की ओर है, जिनमें अधिक से अधिक सीटों पर जीत के जरिये विधानसभा में बहुमत का खेल बिगाड़ा जा सकता है। या फिर भाजपाई विधायकों को तोड़ना दूसरा रास्ता है। इसलिए भाजपा को हर हाल में कांग्रेस से टूटकर आए विधायकों की कमोबेश हर सीट पर जीत के लिए पूरी ताकत झोंकना होगी। इस बात का ध्यान रखना होगा कि इनमें से एक भी चेहरा उससे  नाराज न होने पाए। खुश रखने का इकलौता मार्ग इस समय मंत्री पद ही नजर आ रहा है। इसके अलावा उसे अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं को भी संतुष्ट रखना होगा। जाहिर है कि भाजपा के लिए मामला 'एक को मनाउं तो दूजा रूठ जाता है' जैसा जटिल हो सकता है। खैर, यह सब भविष्य के गर्त में है। सामने जो है, वह है कोरोना वायरस का डर और उससे लड़ने की हमारी वह एकजुटता, जो आज इस भाव से भर रही है कि 'आल इज वेल'।
प्रकाश भटनागर