मध्यप्रदेश : रसूख से नहीं भागता कोरोना,अपनाना पड़ेगी सोशल डिस्टेंसिंग

देशव्यापी लॉकडाउन से काम-धंधा और लोगों का कारोबार अत्याधिक प्रभावित हुआ था। चरणबद्ध ढंग से लॉकडाउन में छूट देने तथा अनलॉक के बाद आर्थिक गतिविधियां एवं कारोबार धीमी गति से आरम्भ हुआ और अब जैसे ही यह कुछ पटरी पर आने लगा तथा जिन्दगी वापस पटरी पर लौट रही थी कि फिर से लॉकडाउन का दौर वापस आ गया है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 24 जुलाई को रात 8 बजे से दस दिन का पूर्ण लॉकडाउन प्रारंभ हो गया है। साथ ही प्रदेश के अलग-अलग जिलों में भी अलग-अलग स्वरुपों में लॉकडाउन लागू है। इसने फिर से कारोबारियों एवं आम लोगों की चिन्ताएं बढ़ा दी हैं। देखने में यह आया है कि लॉकडाउन की असली मार कारोबारियों पर तो पड़ती ही है वहीं आम गरीब और रोज कमाकर खाने वाले दिहाड़ी मजदूर के सामने एक बड़ी समस्या बन जाती है। रसूखदार लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन आम व्यक्ति को पुलिस के डंडों, प्रताड़ना या दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। सरकारों व प्रशासनिक अधिकारियों को लॉकडाउन फैलते हुए संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ने का एकमात्र रास्ता इसलिए नजर आता है क्योंकि उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग लागू करने के लिए एक वैधानिक हथियार मिल जाता है। जबकि हकीकत यह है कि कारोना संक्रमण के फैलाव को रोकने का ना तो लॉकडाउन कोई कारगर उपाय है और ना ही कोई ऐसा इलाज जिसके लगाते ही संक्रमण रफूचक्कर हो जाए। यदि संक्रमण को रोकना है तो पहले राजनेताओं और मंत्रियों पर भी नजर जाना चाहिए जिनके आयोजनों में सोशल डिस्टेंसिंग देखने में नजर नहीं आ रही है।
संक्रमण फैलने से रोकने का एकमात्र प्रभावी तरीका सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क आदि पहनना ही है। राजनीतिक गतिविधियां राजनेता अपने-अपने ढंग से चला रहे हैं और आम आदमी पर टूट पड़ने वाला प्रशासन एवं पुलिस उन पर कार्रवाई करने का ना तो साहस दिखा पाता है और कोई कार्रवाई करना तो दूर उनके सामने कुछ कहने की जगह हाथ बांधकर जो कुछ हो रहा है उसकी अनदेखी अक्सर करता है। जो नये-नये मंत्री बने हैं उनके स्वागत समारोह में सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान तो रखा ही नहीं जा रहा है बल्कि मास्क लगाने की जगह उनके गले में वह लटका नजर आता है। राजनीतिक जमात को वास्तव में अपने गिरेबान में झांक कर देखने की जरुरत है कि क्या वे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। 
धार्मिक स्थलों व मंदिरों एवं सामाजिक आयोजनों की गतिविधियों पर तो रोकथाम है लेकिन राजनीतिक गहमागहमी का माहौल इसलिए है क्योंकि प्रदेश में 27 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है, लेकिन कब होंगे इसको लेकर संशय है। इसके कारण ही राजनीतिक भीड़भाड़ पर भी कोई असर देखने में नजर नहीं आता। मंत्रियों और जिन क्षेत्रों में उपचुनाव होना हैं वहां पर स्वागत सत्कार व छोटी-मोटी रैलियां तथा बिना सोशल डिस्टेंसिंग के लोगों से मिलने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा। सवाल यही है कि आखिर इस पर कौन नियंत्रण लगायेगा, क्योंकि प्रशासन ऐसे मामलों में मूकदर्शक बन जाता है और यह सब करने की अघोषित रियायत उसे मिल जाती है। यदि इन पर रोक नहीं लगेगी तो फिर कोरोना का फैलाव कैसे थमेगा। इस मामले में यदि स्वनियंत्रण हो जाता या फिर प्रशासनिक अधिकारी थोड़ा साहस दिखाते तो शायद लॉकडाउन की नौबत नहीं आती। लॉकडाउन के मामले में भी हर जगह एक-से मापदंड नहीं हैं। भोपाल में लॉकडाउन हो गया है लेकिन इंदौर के बारे में कहा जा रहा है कि चाहे कितने भी संक्रमण के मामले वहां बढ़े हुए मिले, फिलहाल वहां लॉकडाउन नहीं लगाया जायेगा।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार यह अपील करते रहे हैं कि मास्क पहने और सोशल डिस्टेंसिंग का खयाल रखें, लेकिन देखने में यह आया है कि आम लोगों की बात छोड़ भी दी जाए तो जिम्मेदार लोग तक इसका पालन नहीं कर रहे हैं। यहां तक कि शिवराज मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मंत्रीगण लगातार अपने क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और इस दौरान ना तो शारीरिक दूरी का पालन हो रहा है और ना मास्क लगाये जा रहे हैं। यहां तक कि मंत्रालय में जब मंत्रियों ने कार्यभार संभाला उस दौरान साथी नेताओं से उनके गले मिलने के चित्र भी आये। कई मंत्रियों ने सभाएं कीं लेकिन मास्क नहीं लगाया और यदि किसी ने औपचारिकता पूरी की तो वह सिर्फ लटका नजर आया। 
नये मंत्री ही नहीं बल्कि कुछ वरिष्ठ व पुराने मंत्री भी बिना मास्क लगाये अक्सर देखे जाते हैं, जबकि इनके घर व कार्यालयों में कार्यकर्ताओं की भीड़ बनी रहती है। ऐसा नहीं है कि केवल मंत्री ही ऐसा कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के अनेक नेता सार्वजनिक स्थानों पर मास्क का कम ही इस्तेमाल करते हैं, यही स्थिति भाजपा नेताओं की भी है। 27 विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव के कारण दोनों दलों के प्रदेश कार्यालयों में लोगों का आना-जाना बढ़ गया है लेकिन कोरोना से बचाव को लेकर लापरवाही बरती जा रही है। मंत्री ओमप्रकाश सकलेचा मंत्री बनने के कुछ दिन पूर्व ही कोरोना पाजिटिव हो गये थे तो अरविन्द भदौरिया भी कोरोना पाजिटिव पाये गये। भदौरिया ने जो भी लोग उनके संपर्क में आये उनसे सतर्कता बरतने व अपना परीक्षण कराने की अपील भी की। 
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लॉकडाउन में आवाजाही कैसे रोकी जाए, इसको लेकर हर अधिकारी अपने ढंग से अलग-अलग फैसले कर रहा है, भले ही यह अटपटा हो। एक जिले से दूसरे जिले में जाने पर पाबंदी नहीं है लेकिन जहां लॉकडाउन है वहां जाने-आने वाले को ई-पास लगेगा। राजधानी भोपाल में होशंगाबाद रोड पर समरधा गांव के पास लॉकडाउन में रोड ब्लाक करने के लिए सड़क पर मिट्टी डलवा दी गयी, इससे भोपाल से मंडीदीप जाने-आने वालों को काफी परेशानी हुई। इस पर कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए अपने ट्वीट में लिखा कि लॉकडाउन का अधिकार प्रशासन को है लेकिन राजमार्ग बंद करने का नहीं।बाद में मिट्टी हटवा दी गयी। इसी प्रकार इंदौर में नगर निगम के अमले ने अंडे बेचने वाले के ठेले को ही उलट दिया जिससे उसे काफी नुकसान हुआ और अंतत: भाजपा के वरिष्ठ नेताओं व विधायकों ने प्रशासन को आड़े हाथों लिया। ऐसे मामलों को देखते हुए प्रशासन व पुलिस को अधिक संयम बरतना चाहिए।
- अरुण पटेल