योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव नहीं लड़ने के ऐलान के साथ पीएम मोदी का संदेश स्पष्ट

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अयोध्या से चुनाव लड़ने की संभावना समाप्त हो गई है. इसके साथ ही इसको लेकर गर्मागर्म बहस पर भी विराम लग गया है कि अयोध्या से योगी का ब्रह्मास्त्र चलेगा और जातिवादी राजनीति की काट हिन्दुत्व से होगी. मुख्यमंत्री के अयोध्या से चुनाव लड़ने की अटकलों वाली खबरें बीजेपी की दिल्ली में हुई चुनावी बैठक से लीक हुई थीं, यह उत्तर प्रदेश सरकार से मंत्रियों के इस्तीफे और सपा प्रमुख अखिलेश यादव की पार्टी में शामिल होने की खबरों पर हावी होने का प्रयास था.लेकिन आज ये ऐलान भी हो गया कि 49 साल के योगी आदित्यनाथ गोरखपुर शहर सीट से चुनाव लड़ेंगे, जहां से उन्होंने पांच बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया है और जहां से वो गोरखपुर मठ के प्रमुख के तौर पर भी जिम्मेदारी संभालते हैं. इसका पूरे पूर्वांचल पर काफी प्रभाव माना जाता है.
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगला विधानसभा चुनाव गोरखपुर से लड़ेंगे. योगी के लिए अय़ोध्या से चुनाव लड़ने की दो बड़ी वजहें होतीं. पहला ये कि इससे उनका हिन्दुत्व के चेहरे के तौर पर कद और बढ़ता. दूसरा बीजेपी का प्रचार के दौरान इस बात पर जोर रहता कि पार्टी ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है. यह देश के शीर्ष पद के लिए दावेदारी के लिए अहम साबित हो सकता था. 
हालांकि अगर आप यूपी में "रामराज्य" लाने की बात करते हैं, वो यूपी जो 80 लोकसभा सीटों के साथ भारतीय राजनीति में सबसे ज्यादा ताकत रखता है, लेकिन आपको आगे बढ़ने के लिए दावेदार के तौर पर नहीं देखा जा सकता. योगी अपनी उम्मीदों की सूची से कुछ चीजों को छोड़ सकते हैं. पीएम मोदी और अमित शाह ने उन्हें यूपी में पार्टी के लिए पूर्व संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर आगे किया है, लेकिन उन्हें गोरखपुर में बनाए रखकर पीएम ने अचूक संदेश के साथ उनके लिए कुछ सीमाएं तय कर दी हैं, : अपनी बारी का इंतजार करें.  केवल एक ही हिन्दुत्व आइकन हो सकता है,  "हिन्दू हृदय सम्राट", और मौजूदा समय में वो पद भरा हुआ है. 
पांच साल पहले मुख्यमंत्री बनाए जाने से पहले योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि वो ये जिम्मेदारी लेना चाहते हैं, उन्हें कॉलमिस्ट से साफ कहा था कि उन्हें दिल्ली की बेकार राजनीति में कोई रुचि नहीं है. वास्तव में, वास्तव में, वह संघ के साथ टकराव के रास्ते पर थे क्योंकि वह पूर्वी यूपी में अपने मनमुताबिक चीजों को तय करना चाहते थे. योगी का अभी भी अपना अलग ही पहचान या व्यक्तित्व है. उनके प्रशंसक पत्रकारों को यह कहते नहीं थकते कि वह पीएम के लिए आदर्श भगवाधारी उम्मीदवार हैं.
जब उनकी सरकार ने कोरोना की दूसरी लहर से निपटने में लचर रुख प्रदर्शित किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके गलत कदमों की आलोचना होने लगी तो मोदी सरकार को आगे आकर कई सुधारात्मक कदम उठाने पड़े. सूत्रों का कहना है कि उस वक्त पीएम मोदी और अमित शाह कोरोना महामारी से निपटने के उनके कदमों को लेकर नाराज थे, यही वजह थी कि आरएसएस ने चार दिनों के लिए अपनी एक टीम लखनऊ भेजी थी, ताकि योगी सरकार को लेकर जन भावनाओं को भांपा जा सके. कैबिनेट मंत्रियों समेत बीजेपी के कई विधायकों ने यूपी में स्वास्थ्य ढांचे की खराब हालत को लेकर सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रखी.
हाल ही में कैबिनेट मंत्री पद छोड़ने वाले पिछड़े वर्ग के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी पार्टी की बैठक में सीएम योगी द्वारा कोविड के कुप्रबंधन को लेकर अपनी बात रखी थी.  लेकिन योगी को इसको लेकर कोई पछतावा नहीं था और आलोचनाओं को उन्होंने खारिज किया. संघ द्वारा भी उनको क्लीनचिट मिलने के बाद इसे और मजबूती मिली. 
मुख्यमंत्री के लिए चुनाव लड़ने अयोध्या न जाने पर मैंने योगी की मुस्तैद रहने वाली सेना, हिन्दू युवा वाहिनी के कुछ सदस्यों से सवाल किया. वो बेहद स्पष्ट थे,  "महाराज (यूपी में योगी के लिए प्रचलित नाम) का दिल अयोध्या में रचा बसा है, क्योंकि उन्होंने भगवान राम को निर्वासन से बाहर निकाला है और उनके घर में पदस्थापित कराया है. " लेकिन हिन्दुत्व के मुखर चेहरे के तौर पर उनकी लोकप्रियता को लेकर कुछ नेताओं को समस्या भी है.
योगी के चुनाव का प्रबंधन करने वाले कुछ निष्ठावान नेताओं ने कहा, अगर महाराज पूर्वांचल से चुनाव लड़ते हैं तो इसका पूरे क्षेत्र में बहुत अच्छा असर होगा. गोरखपुर सदर सीट योगी आदित्यनाथ के लिए संभवतः सबसे सुरक्षित सीट है और इससे उनके लिए पश्चिमी यूपी में बेरोकटोक चुनाव प्रचार करने के लिए आजादी होगी. इस जाट बेल्ट में किसान आंदोलन को लेकर नाराजगी के कारण बीजेपी को अपना प्रदर्शन दोहराने में कुछ संदेह है.
योगी सार्वजनिक तौर पर ये कहते रहे हैं कि वो ये चुनाव इस बात के साथ लड़ रहे हैं कि उनके मुकाबले चुनाव मैदान में कोई नहीं है. इसमें कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, बसपा प्रमुख मायावती और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव शामिल हैं. यूपी सरकार के अभी तीन मंत्रियों ने अखिलेश यादव का दामन थामा है. मायावती पहले ही ये कह चुकी हैं कि वो चुनाव नहीं लड़ेंगी. जबकि बाकी दो अन्य विपक्षी नेता अभी कशमकश में हैं कि योगी की उम्मीदवारी के ऐलान के बाद क्या उनके लिए भी चुनाव लड़कर मैदान में आना जरूरी है.
वास्तव में बीजेपी द्वारा पहली लिस्ट जारी करने के साथ पीएम मोदी और अमित शाह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हालांकि योगी खुद को स्वतंत्र माना जाना पसंद करते हैं, जिन्हें यह नहीं बताया जाता कि उन्हें क्या करना है, लेकिन वास्तव में वे भी नियंत्रण के अधीन हैं. योगी के डिप्टी केशव प्रसाद मौर्य, जो मथुरा से चुनाव लड़ने के लिए बेचैन था- मथुरा जो कृष्ण जन्मभूमि हैं, जहां मस्जिद की जगह नए मंदिर के निर्माण का अभियान छेड़ा गया है. इसकी बजाय  उन्हें प्रयागराज की सिराथू सीट से चुनाव लड़ने को कहा गया है.
मथुरा से मौजूदा विधायक श्रीकांत शर्मा चुनाव लड़ेंगे. मौर्य और शर्मा आमने-सामने नहीं दिखते. यह युक्ति ज्यादा गोपनीय नहीं है. जिन 107 टिकटों का आज ऐलान किया गया है, उनमें से 44 टिकट ओबीसी समुदाय के नेताओं को दिया गया है. साथ ही 19 दलितों और 10 महिलाओं को प्रत्याशी बनाया गया है. 
स्वाति चतुर्वेदी
(स्वाति चतुर्वेदी लेखिका और पत्रकार हैं, जो 'इंडियन एक्सप्रेस', 'द स्टेट्समैन' तथा 'द हिन्दुस्तान टाइम्स' के साथ काम कर चुकी हैं)