कांग्रेस सोच और रणनीति बदलेगी या एम्बेसडर कार बनेगी?

दिल्ली के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर अपना खाता ना खोल पाने की टीस अब कांग्रेस नेताओं के मन में खुलकर सामने आने लगी है और वे अपना संदेश आलाकमान तक पहुंचाने में किसी प्रकार का परहेज नहीं कर रहे हैं और ना ही शब्द आडम्बरों के मखमली मुलम्बे चढ़ाकर घुमा-फिराकर अपनी बात कह रहे हैं। किसी समय देश की सबसे बड़ी पार्टी रही और आजादी की लड़ाई की अगुवा कांग्रेस पार्टी 2014 से जिस प्रकार केन्द्रीय फलक पर कमजोर होती जा रही है उसके कारण पहले भले ही कांग्रेस नेता खुलकर न कह रहे हों लेकिन अब वे अपनी बात मीडिया के माध्यम से आलाकमान तक पहुंचा रहे हैं। सवाल यही है कि क्या कांग्रेस देश में बदलते परिवेश के अनुकूल अपनी सोच रणनीति व दिशा बदलेगी या वह भी आगे चलकर एम्बेसडर कार की तरह हो जाएगी। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बिना लाग लपेट के अपनी बात दो-टूक शब्दों में कही है और उसका सीधा संकेत यही है कि अब कांग्रेस अपने आपको बदले। कुछ कांग्रेस नेताओं ने यहां तक कह दिया है कि कांग्रेस दूसरे की जीत में और किसी की हार में अपनी खुशियां ढूंढने के स्थान पर स्वयं के हालात पर आत्मचिंतन करे या फिर अपनी राजनीतिक दुकान बंद कर दे।
सिंधिया ने पार्टी को रणनीति बदलने और अपनी सोच में परिवर्तन लाने की सलाह दी है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि पार्टी के लिये देश की राजधानी में यह स्थिति बेहद निराशाजनक है नई विचारधारा और नई कार्यप्रणाली की तत्काल जरूरत है। देश बदल गया है, इसलिये हमें भी नये तरीके से सोचना होगा और देश के लोगों से सम्पर्क करना होगा। टीकमगढ़ के पृथ्वीपुर में प्रवास पर आये सिंधिया ने कहा है कि 70 साल में देश में काफी बदलाव आया है हमें देश के लोगों को नये तरीके से जोड़ने के बारे में सोचना होगा और कार्यप्रणाली बदलने की आज जरूरत है। हमें बदलाव की मानसिकता बदले हुए परिवेश में अपने को ढालने की जरूरत है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा में विपक्ष के नेता भ्ाूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने भी इस बात पर जोर दिया है कि दिल्ली की हार के बाद कांग्रेस के लिये गंभीर आत्मचिंतन और मनन का वक्त है। हरियाणा की तरह दिल्ली में भी कांग्रेस ने देर से फैसले लिये इस कारण से इस तरह के परिणाम आये। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर फैसले समय पर लिये जाते तो निश्‍चित तौर पर नतीजे कुछ अलग होते। वैसे कांग्रेस और भाजपा दोनों में निर्णय लेने में देरी की जा रही है हालांकि भाजपा ने अब मप्र अध्यक्ष के रूप में कमान खजुराहों के सांसद वीडी शर्मा को सौंप दी है जबकि कांग्रेस एक साल बीतने के बाद भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कौन होगा यह तय नहीं कर पायी है। इस कारण कमलनाथ मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों पद संभाले हुए है हालांकि वे भी नया अध्यक्ष चुनने की पेशकश कर चुके है। जयराम रमेश और वीरप्पा मोइली भी बदलाव की बात कह चुके हैं। दिल्ली के अलावा यूपी और बिहार की स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि पार्टी को खुद में भी बड़ा बदलाव करना होगा नहीं तो अप्रसांगिक हो जाएगी। उनका कहना है कि अगर प्रसांगिक रहना है तो कांग्रेस पार्टी को यह करना ही होगा वरना हमारा कोई महत्व नहीं बचेगा हमें अहंकार छोड़ना होगा। छ: साल सत्ता से बाहर रहने के बावजूद भी हममें से कुछ ऐसे हैं जो मंत्रियों जैसा व्यवहार करते हैं जबकि मोइली ने पार्टी को जिंदा करने के लिए सर्जिकल एक्शन की जरूरत निरूपित की है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी और दिल्ली महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी ने सवाल उठाते हुए पी. चिदंबरम के ट्वीट पर तीखा हमला किया था कि पार्टी को अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिये।
कुल मिलाकर कांग्रेस में चिंता का मूल केन्द्रीय स्वर यही है कि अब वह अपने में बदलाव करे। ऐसा अब किसी छोटी-मोटी कास्मेटिक सर्जरी से संभव नहीं होगा बल्कि सर्जिकल स्ट्राइक करना ही एकमात्र रास्ता है। अन्यथा दीवार पर जो इबारत नजर आ रही है उसकी अनदेखी कांग्रेस के भविष्य के सामने एक बड़ा सवालिया निशान लगा देगी। अब कांग्रेस आलाकमान को यह मन बनाना होगा कि होम्योपैथिक की मीठी गोलियों के स्थान पर बड़े पैमाने पर चीर-फाड़ करे। उन चेहरों से निजात पाए जो दशकों से केन्द्रीय फलक पर सक्रिय हैं। नई ताजगी ऊर्जा स्फूर्ति नये चेहरों और नई टीम से ही आ पाएगी और यह सब किश्तों में नहीं एक-दो किश्तों में ही करना होगा, छुटपुट कास्मेटिक सर्जरी कांग्रेस करती रही है और उसी का नतीजा है कि जमीन से कटे और दिल्ली से जुड़े नेता मैदान में कांग्रेस को मजबूत नहीं कर पा रहे हैं। मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रप को आगे लाये बिना लम्बे समय तक कांग्रेस प्रासंगिक नहीं रह सकती। आलाकमान को एक ऐसे कुशल सर्जन की तरह पेश आना होगा जिसके हाथ ऑपरेशन करते समय अपने अतिप्रिय पात्रों के चेहरे देखकर ना कांपें और वह ऑपरेशन को अंतिम अंजाम तक पहुंचाने के लिये दृढ़ निश्‍चयी हों। सबको साधने के स्थान पर बिना लाग लपेट के यदि हाईकमान ऐसे चेहरों की तलाश कर लेता है जो मौजूदा परिवेश में पूरी तरह प्रासंगिक हैं तो फिर उन्हें आगे लाना होगा और जिसे आगे लायें उसे पूरी ताकत भी देनी होगी। किसी की राजी नाराजी की परवाह करते हुए सभी को साथ रखने की निरन्तर चलने की प्रक्रिया से ही कांग्रेस कमजोर हुई है इस हकीकत को भी स्वीकार करना होगा।
कांग्रेस आलाकमान को इस बात का भी मंथन करना होगा कि आखिर वह धीरे-धीरे अप्रासांगिक क्यों होती जा रही है। समय के अनुसार अपने आपमें परिवर्तन क्यों नहीं कर रही, एक समय शाही सवारी मानी जाने वाली कार जब परिदृश्य से ओझल हो सकती है तो पुराने ढर्रे पर चलते हुए कोई लम्बे समय तक नई पीढ़ी की सोच और सवालों से अपने आपको जोड़े नहीं रख सकता। अपनी शैली नीति और ढर्रे में परिवर्तन ना करने के कारण धीरे-धीरे जो हालत कम्युनिस्टों की होती जा रही है वही आगे चलकर कांग्रेस की ना हो यही चिंता बड़े कांग्रेस नेताओं की है। इसकी अनदेखी पार्टी को भारी पड़ सकती है क्योंकि अब जो स्वर निकले हैं वही समस्या के बुनियादी कारण है और इसे सही संदर्भ में समझे बिना आगे की राह आसान होने वाली नहीं है।
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दिल्ली में कांग्रेस की हार पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने इन हालातों की कुछ यूं व्याख्या की कि भाजपा सरकार बनाने का दावा कर रही थी वह पूरी तरह से साफ हो गई। भाजपा के खिलाफ लोगों ने नाराजगी प्रकट की और कांग्रेस का पूरा वोट बैंक भाजपा को हराने में लग गया। कांग्रेस के दिल्ली में बैठे कुछ बड़े चेहरों ने भी भाजपा की हार में अपनी जीत देखी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस बदल नहीं सकती या उसमें नयापन नहीं आ सकता या वह चुनौतियों का सामना नहीं कर सकती। दिग्विजय सिंह ने यह साबित कर दिया है कि यदि कोई नेता दिल्ली को छोड़कर अपने-अपने प्रदेशों में सक्रिय हो जाए तो वह भाजपा की मजबूत सत्ता को उखाड़ फेंक सकता है। डेढ़ दशक बाद मध्यप्रदेश में फिर से कांग्रेस पदारूढ़ हुई है तो उसमें एक अहम भ्ाूमिका केवल दिग्विजय सिंह की है जिन्होंने संगत में पंगत कर कांग्रेसजनों को जोड़ा और सभी नेताओं के बीच जहां तक अधिकतर संभव हुआ मन मुटाव दूर कराकर सक्रिय किया। लगभग 3600 किलोमीटर की पैदल नर्मदा परिक्रमा कर ऐसा माहौल बनाया कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दो चेहरे सामने थे तो जमीनी और मैदानी जमावट जो माहौल को मतों में परिवर्तित करने की क्षमता रखती है उस काम के असली सूत्रधार दिग्विजय सिंह थे। दिल्ली की राजनीति छोड़कर वे कई माह मध्यप्रदेश में जमे रहे और उसी का नतीजा है कि यहां भाजपाई सत्ता पर ग्रहण लग सका।
- अरुण पटेल