मध्यप्रदेश : तलाश एक मातम शिरोमणि की

मातम पुरसी की विधा में सिद्धहस्त लोगों का एक बड़ा काम होता है। वे ऐसे समय पर दु:खी होने का स्वांग करने वालों के अहम मददगार साबित होते हैं। रोने का ढोंग करने से आंसू नहीं आ जाते। ऐसे मेंं ये मातम शिरोमणि अगले को खुद के बाहुपाश में जकडकर विलाप की सम्पूर्ण अभिनय क्षमता के साथ उसे यूं दबाते हैं कि अगला दर्द के मारे ही सही, सही में रो पड़ता है। ऐसे ही किसी हुनरबाज की मध्यप्रदेश कांग्रेस में भी सख्त कमी महसूस हो रही थी। यहां मातमी मुद्रा में कई ऐसे दिग्गज दिख रहे हैं, जिनके आंसू ढलक नहीं पा रहे। अश्क आंखों से बेदखल नहीं हो रहे, लिहाजा दु:खी दिखने की उनकी कोशिशें मजाक बनकर रह जा रही हैं। अब सोमवार को दिग्विजय सिंह ने दिल्ली में धमाका किया कि भाजपा, कांग्रेस के 8-10 विधायकों को 25-25 करोड़ रूपए देकर खरीद रही है। जो मजेदार बात उन्होंने कहीं वो यह थी कि भाजपा के नेता एक हो गए हैं और कांग्रेस सरकार गिराने के बाद शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बनेंगे और नरोत्तम मिश्रा उप मुख्यमंत्री बनेंगे। अब अगर वाकई में ऐसा हो गया है तो दिग्विजय सिंह खुश हो रहे हैं या कमलनाथ और कांग्रेस आलाकमान को चमका रहे हैं। लोकसभा का चुनाव वे हार चुके हैं और राज्यसभा का उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है। मार्च में ही चुनाव हैं, तो दिग्विजय सिंह ने इशारों में अपनी आशंकाएं साझा कर संकेत दे दिया है कि उन्हें पार्टी फिर से राज्यसभा में भेज दें तो ही भलाई है, वरना तो फिर...

मातम पुरसी की विधा में सिद्धहस्त लोगों का एक बड़ा काम होता है। वे ऐसे समय पर दु:खी होने का स्वांग करने वालों के अहम मददगार साबित होते हैं। रोने का ढोंग करने से आंसू नहीं आ जाते। ऐसे मेंं ये मातम शिरोमणि अगले को खुद के बाहुपाश में जकडकर विलाप की सम्पूर्ण अभिनय क्षमता के साथ उसे यूं दबाते हैं कि अगला दर्द के मारे ही सही, सही में रो पड़ता है। ऐसे ही किसी हुनरबाज की मध्यप्रदेश कांग्रेस में भी सख्त कमी महसूस हो रही थी। यहां मातमी मुद्रा में कई ऐसे दिग्गज दिख रहे हैं, जिनके आंसू ढलक नहीं पा रहे। अश्क आंखों से बेदखल नहीं हो रहे, लिहाजा दु:खी दिखने की उनकी कोशिशें मजाक बनकर रह जा रही हैं। अब सोमवार को दिग्विजय सिंह ने दिल्ली में धमाका किया कि भाजपा, कांग्रेस के 8-10 विधायकों को 25-25 करोड़ रूपए देकर खरीद रही है। जो मजेदार बात उन्होंने कहीं वो यह थी कि भाजपा के नेता एक हो गए हैं और कांग्रेस सरकार गिराने के बाद शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बनेंगे और नरोत्तम मिश्रा उप मुख्यमंत्री बनेंगे। अब अगर वाकई में ऐसा हो गया है तो दिग्विजय सिंह खुश हो रहे हैं या कमलनाथ और कांग्रेस आलाकमान को चमका रहे हैं। लोकसभा का चुनाव वे हार चुके हैं और राज्यसभा का उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है। मार्च में ही चुनाव हैं, तो दिग्विजय सिंह ने इशारों में अपनी आशंकाएं साझा कर संकेत दे दिया है कि उन्हें पार्टी फिर से राज्यसभा में भेज दें तो ही भलाई है, वरना तो फिर....
कमलनाथ सरकार में इस समय मजेदार किस्से हो रहे हैं। राज्यसभा चुनाव और बजट सत्र क्या एक साथ आए, सरकार पर दबाव बनाने के सारे खेल एक साथ शुरू हो रहे हैं। दो दिन पहले मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर एक बैठक में अपने अधीनस्थ अफसर के पांव पकडकर फफकने वाली मुद्रा में आ गये। अपने विधानसभा क्षेत्र के लिए  स्वीकृत काम भी शुरू न होने के चलते उन्हें यह मुद्रा अपनाना पड़ी। बंद कमरे से बाहर जो खबर आयी, उसमें का गीलापन कतई नहीं था। न उन आंसूओं की नमी थी, जो ऐसे हालात में मंत्री महोदय की आंखों से निकलने चाहिए थे। और न ही उस पसीने का गीलापन था, जो ऐसी स्थिति में संबंधित अफसर के जिस्म से डर के मारे फूट पडना चाहिए था। वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास समर्थकों में से एक हैं। चर्चा सिंधिया के भी राज्यसभा में जाने की है। लेकिन खबर यह भी है कि सिंधिया अब राज्यसभा में जाने से ज्यादा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर ही जोर देंगे।
एक दिन पहले अजय सिंह राहुल भी रेगिस्तान जैसी सूखी आंखों के साथ गमगीन दिखे। पहले कांग्रेसियों से शिकवा किया कि उनकी बदौलत ही वे पहले विधानसभा और  बाद में लोकसभा का चुनाव हार गये। अगले क्रम में वे राज्य सरकार के लिए यह कह गए कि वहां उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। जाहिर है विपक्ष में भाजपा सरकार के साथ संघर्ष के दौर में मुख्य भूमिका निभाने वाले अजय सिंह इस समय हाशिए पर हैं। उनके प्रभाव क्षेत्र सीधी में कमलनाथ जिस तरह कमलेश्वर पटेल को तवज्जो दें रहे हैं, यह भी उनके लिए नागवार है। कायदे से राज्यसभा के लिए अजय सिंह भी एक सशक्त दावेदार होना चाहिए थे। लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के फेर में न तो अजय सिंह और ना ही अरूण यादव जैसे नाम सामने आ रहे हंै जिन्होंने वास्तव में शिवराज सरकार से किला लड़ाया था।
इधर कम्प्यूटर बाबा चले तो थे रेत माफिया को रुलाने, लेकिन अब खुद उनके ही रोने की बारी आ गयी लगती है। मंत्री प्रदीप जायसवाल ने उनकी इस मुहिम के गुब्बारे में सुई चुभोकर उसकी हवा निकालने का पुख्ता बंदोबस्त कर दिया है। और प्रदीप जायसवाल ने कहा भी गलत नहीं है, कम्प्यूटर बाबा कोई खनन के वैज्ञानिक जानकार तो हैं नहीं। उमंग सिंघार का जिक्र भी जरूरी है, जिन्होंने अपने विभाग के एक आला अफसर का रोना बजरिये खत मुख्यमंत्री कमलनाथ के आगे किया है। एसीएस स्तर के इस अफसर का विरह यह कि उसे मुख्य सचिव के पद से दूर किया जा  रहा है। वैसे भी इस अफसर की किसी से पटरी बैठना हमेशा मुश्किल रहा है। कुल जमा मामला यह कि नागमति से भी ज्यादा दारुण प्रवृत्ति वाले कांग्रेसियों के यह वर्णन राज्य के सत्ता प्रतिष्ठान को रुदाली वाले माहौल से भर चुके हैं। सरकार इस पर चुप है। उसके असरकार तत्व भी मौन साधे बैठे हैं। यह लाजमी है। अब मंत्रियों या पार्टीजनों के 'दुखवा मैं का से कहूं सजनी' पर शोभा ओझा या नरेंद्र सलूजा तो प्रतिक्रिया देने से रहे।
सब जानते हैं कि प्रधुम्न सिंह तोमर इस बात की सजा भुगत रहे हैं कि वे ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के हैं। किसी से नहीं छिपा कि अजय सिंह राहुल का कसूर सिर्फ इतना है कि वक्त उनका साथ नहीं दे रहा है। यह तथ्य सर्वव्यापी है कि दिग्विजय सिंह द्वारा लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी हिंदू छवि चमकाने के लिए इस्तेमाल किए गए कम्प्यूटर बाबा की हैसियत अब नक्कारखाने में तूती वाली हो चुकी है। यह कोई बड़ा रहस्योद्घाटन नहीं है कि सिंघार को राज्य के शैडो मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से खुले पंगे के चलते एक तेजतर्रार अफसर के लिए खून के घूंट पीकर रह जाना पड़ रहा है। अब टाप टू, बाटम, इतना दु:ख। ऐसी उपेक्षा। इतना अपमान। लेकिन मजाल है कि आंखों से एक बूंद भी आंसू टपक जाए। किसी ने लिखा था, 'एक अश्क उसकी आंख का मुझको डुबो गया। वाकिफ नहीं था बूंद की गहराइयों से मैं।' लेकिन यहां कोई डूबेगा भला कैसे? एक अश्क तो दूर, उसकी परछाई तक आंख के आसपास नहीं फटकती है। यह दु:ख का वह स्वरूप है, जिसके आंसुओं के साथ पाणिग्रहण के बगैर उसकी संपूर्णता कतई स्वीकार नहीं की जा सकती है। मौका है तो एक शेर और याद आ गया। लिखा गया था, 'थमते-थमते थमेंगे आंसू। रोना है, कोई मजाक नहीं है।' तो क्या यहां यह लिख दें कि, 'आते-आते आएंगे आंसू। सियासत है, कोई मजाक नहीं है।'
अरे भैया! इतना ही दर्द है तो क्यों नहीं बुक्का फाडकर रोते हुए उसका इजहार कर देते हो! कहीं ऐसा तो नहीं कि दर्द है ही नहीं। शायद मामला चाहत का है। जिसे तकलीफ का भेष धारण करवा दिया गया हो। दिग्विजय सिंह दिल्ली में धमाका कर कमलनाथ को बता रहे हों कि क्या खाक सरकार चला रहे हों? तोमर शायद मुख्यमंत्री को इस खबर के जरिए लज्जित करवाना चाह रहे हों कि इस सरकार में अफसरशाही किस कदर हावी है। अजय सिंह संभवत: उपेक्षा वाली सचाई के जरिये वक्त बदलने की अपनी इकलौती उम्मीद को हवा देने का जतन कर रहे हों। जायसवाल अपने महकमे में कम्प्यूटर बाबा की नाहक दखलंदाजी के चलते शिकवा-शिकायत के जरिये उन पर प्रहार कर रहे हों। यदि ऐसा है तो फिर हमें आंसुओं की अनुपस्थिति को खामखां ईश्यू नहीं बनाना चाहिए।

प्रकाश भटनागर