मध्यप्रदेश : कांग्रेस में असंतोष की जड़ में संवादहीनता भी

मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों से जो सियासी माहौल अपने चरम पर है और सरकार की अस्थिरता को लेकर जो सवाल उठाए जा रहे हैं उस पर फिलहाल तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सक्रियता और मोर्चा संभाल लेने के बाद एक प्रकार से विराम लग गया है। फिलहाल यह फौरी राहत के समान है। अभी तो खेल चालू हुआ है और अंतत: इसका पटाक्षेप कौन करेगा यह मार्च मासान्त तक ही पता चल सकेगा। 13 मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन भरने का अन्तिम दिन है। इस दिन बहुत कुछ साफ हो जाएगा। यदि मतदान के लिए नौबत आती है तो फिर 26 मार्च को इसके नतीजे सामने आएंगे। बजट सत्र के समापन तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री कमलनाथ पार्टी के सभी विधायकों एवं बाहर से समर्थन दे रहे विधायकों को एकजुट रख पाते हैं तो फिर सरकार की स्थिरता को लेकर भाजपा नेताओं द्वारा समय-समय पर जो सवाल उठाये जाते हैं उन पर भी कुछ अधिक अंतराल के लिए विराम लग जायेगा। कांग्रेस में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, मौजूदा हालातों को देखते हुए यदि कोई कांग्रेस नेता ऐसा माहौल बनाता है तो वह वास्तविकता की अनदेखी से अधिक कुछ नहीं होगा। कांग्रेस में असंतोष की जड़ में संवादहीनता भी है ।
कांग्रेस,बासपा,सपा और निर्दलीय मिलाकर दस विधायकों को गुरुग्राम ले जाया गया और बाद में उनमें से चार को बैंगलुरू ले जाये जाने के साथ ही उनमें से एक कांग्रेस विधायक हरदीप सिंह डंग के द्वारा अपनी उपेक्षा और पीड़ा का इजहार करते हुए विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति और मुख्यमंत्री कमलनाथ को त्यागपत्र भेजने की सोशल मीडिया में चर्चा होते ही कांग्रेस की राजनीति जो पहले से ही सियासी तनाव में थी वह अपने चरम पर पहुंच गयी है। वैसे डंग के इस्तीफे को त्यागपत्र नहीं माना जा सकता भले ही उसमें त्यागपत्र का उल्लेख हो। इस पत्र में इतनी सावधानी अवश्य बरती गयी थी कि उसमें उनकी घ्ाुटन की अभिव्यक्ति थी और ऐसा त्यागपत्र मंजूर नहीं हो सकता। त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष को आकर स्वयं विधायक को देना होता है या यह सूचित करना होता है कि यह उन्होंने ही भेजा है। वैसे भी त्यागपत्र वही पत्र माना जाता है जो कि तीन-चार लाइन से अधिक न हो और उसके साथ कोई अन्य बात न कही गयी हो। इसके बावजूद भी अध्यक्ष विधायक को बुलाकर अपनी संतुष्टि करते हैं कि यह पेशकश उन्होंने स्वेच्छा से की है या नहीं। दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया में जिस त्यागपत्र ने सियासी ड्रामें को चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया था वह न तो विधिवत त्यागपत्र था और जहां पहुंचाया जाना चाहिए था वहां भी नहीं पहुंचा था। त्यागपत्र में अन्य मुद्दों के अलावा एक मुद्दा प्रदेश नेतृत्व और आलाकमान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें उस बात की ओर संकेत किया गया है जो पीड़ा अन्य कुछ कांग्रेस विधायकों के साथ ही उन नेताओं व कार्यकर्ताओं को भी है जो यह महसूस करते हैं कि भले ही संघर्ष के दिनों में वे पार्टी के साथ खड़े रहे हों लेकिन अवसर उन्हें ही मिलते हैं जो किसी न किसी प्रदेश के स्थापित नेता से जुड़े होते हैं। हरदीप सिंह डंग ने अपने पत्र के अन्त में यह भी कहा है कि उन्हें मंत्रिमंडल में शायद इसलिए स्थान नहीं मिला क्योंकि वे कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी के गुट से नहीं जुड़े हैं और पार्टी के लिए हमेशा संघर्ष करते रहे हैं।
कांग्रेस में संकट के जो कुछ बादल उमड़े-घ्ाुमड़े थे उनको सही संदर्भ में समझने और उसे अभिव्यक्त करने में केवल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने जो कहा वही असली कारण है और उसके कारण ही संवादहीनता की स्थिति है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि कांगे्रस विधायकों के टूटने और भाजपा की ओर झुकाव की एक बड़ी वजह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद भी है। अगर प्रदेश अध्यक्ष अलग से होता तो ऐसे हालात नहीं बनते, वर्तमान में ऐसे व्यक्ति की जरुरत है जो लगातार प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बैठे और कार्यकर्ताओं के असंतोष को खत्म करे। तन्खा ने जो कहा है वही कांग्रेस में पनप रहे असंतोष की असली वजह है। विधायक व कांग्रेस कार्यकर्ता यह महसूस कर रहे हैं कि वे अपनी बात ऊपर तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। मुख्यमंत्री की अपनी व्यस्तताएं होती हैं और सुरक्षा का मजबूत घेरा भी रहता है। ऐसे में उन तक पहुंचना आसान नहीं रहता। अधिकांश विधायकों की भी यह सोच एवं शिकायत है कि संवादहीनता के हालात हैं और वे अपनी बात सत्ता व संगठन नेतृत्व को नहीं पहुंचा पा रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल प्रदेश अध्यक्ष होता तो असंतोष इतना नहीं पनप पाता और विधायक व अन्य कार्यकर्ता और नेता अपनी बात उन तक पहुंचाते तथा उनके माध्यम से समस्या मुख्यमंत्री तक पहुंचती। इससे असंतोष इतना अधिक घनीभ्ाूत नहीं होता जितना कि इस समय सतह पर आ गया है। यह सब भाजपा नेताओं द्वारा प्रायोजित था या फिर कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति का नतीजा था यह बात तो देर-सबेर पता चल ही जाएगी, लेकिन यह सही है कि यदि कांग्रेस के विधायकों में असंतोष था या भाजपा नेता उन्हें अपने मोहपाश में आकर्षित कर रहे थे तो इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी कांग्रेस की है। कांग्रेस के विधायकों को सहेज कर रखना और वे विपक्ष की बातों में न आयें यह भी पार्टी के उन लोगों के लिए जरुरी है जो नेतृत्व की कतार में आते हैं। अपना घर चुस्त-दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी पार्टी नेतृत्व की ही है। यदि कांग्रेस के अंदर असंतोष पनप रहा है और विधायक उसको व्यक्त करते रहे हैं तो उस पर समय रहते ध्यान देने की जरुरत थी ताकि ऐसे हालात न बनें जैसे कि आज बन गये हैं।
एक बात साफ है कि सीधे-धीरे ताजा घटनाक्रम राज्यसभा चुनाव से जुड़ा है। कांग्रेस विधायकों के सामने इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता था कि वे अपनी पीड़ा का इजहार करें। विधायक भी जानते हैं कि उनकी पूछ-परख राज्यसभा चुनाव के समय अधिक होती है। यह घटनाक्रम इशारा भाजपा की ओर कर रहा है क्योंकि वह हर हाल में राज्यसभा की दो सीटें जीतना चाहती है। कांग्रेस को इसके लिए जोड़तोड़ की जरुरत नहीं रहेगी यदि वह अपना घर चुस्त दुरुस्त रख पायेगी, केवल उसे एक या दो मत की आवश्यकता होती जबकि भाजपा को लगभग 9 ऐसे विधायकों का समर्थन जुटाना होता जो कांग्रेस के हों या उसे सहयोग दे रहे हैं। भाजपा की इसमें दो रणनीति हो सकती थीं कि या तो कुछ विधायकों के त्यागपत्र करा दिए जायें या ऐसी व्यवस्था की जाए कि वे मतदान में भाग न लें। कांग्रेस को दो सीटें इसलिए आसानी से मिल जाती क्योंकि उसके पास बाहर से समर्थन दे रहे चार निर्दलियों और तीन बसपा-सपा के विधायकों का समर्थन हासिल है। जहां तक इन दलों के तीन विधायकों का सवाल है उन्होंने कभी भी ऐसा नहीं कहा कि वे सरकार का समर्थन नहीं करेंगे या उसके साथ नहीं हैं। जहां तक प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का सवाल है तो यह निर्णय कांग्रेस हाईकमान को करना है। लम्बे समय तक ऐसे फैसले टालना पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाते रहे हैं इसकी कुछ बानगी अन्य राज्यों में देखने को भी मिली है।  
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असंतुष्ट विधायकों की शिकायत चाहे वे कांग्रेस के हों या समर्थन दे रहे विधायक या अन्य दलों व निर्दलीय हों, अधिकांश मंत्री उन्हें आसानी से नहीं मिलते हैं और न ही उनकी कही बातों को तवज्जो देकर उस पर अमल करते हैं। मंत्रियों के बारे में तो हमेशा इस प्रकार की शिकायत कार्यकर्ताओं और विधायकों को रही है चाहे सरकार भाजपा की रही हो या कांग्रेस की। संवादहीनता की स्थिति खत्म हो और मंत्री आसानी से मिल पायें, यदि इसकी समय रहते व्यवस्था नहीं हो पाई तो फिर भविष्य में इस प्रकार की परिस्थितियां पुन: कभी भी सतह पर आ सकती हैं।
- अरुण पटेल