मध्यप्रदेश : कहीं कम कहीं ज्यादा: असंतोष की आग में झुलस रही भाजपा-कांग्रेस

भाजपा और कांग्रेस के  नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के कोरोना महामारी से संक्रमित होने के बढ़ते मामलों के चलते उपचुनाव संबंधी मैदानी गतिविधियां बुरी तरह से प्रभावित  हुई हैं। अब केवल वर्चुअल रैलियों और बैठकों तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से संपर्क और प्रचार सिमटकर कर रह गया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ही असंतोष सुलग रहा है कहीं कम है तो कहीं ज्यादा, पर इससे दोनों अछूते नहीं हैं। सत्ता खोने के बाद भी कांग्रेस नेताओं ने लगता है कोई सीख नहीं ली है। गुटों में  बंटी कांग्रेस के बड़े नेता भले ही अपनी महत्वाकांक्षाओं के अंधे घोड़ो को अलग दिशाओं में ना दौड़ा रहे हों लेकिन समर्थकों में जरूर खींचतान चल रही है। भाजपा में भी असंतोष कम नहीं हो पा रहा है बल्कि जितना डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की जा रही है उतना ही बढ़ रहा है। देखने की बात यही होगी कि 27  विधानसभा उपचुनावों से पूर्व भाजपा और कांग्रेस अपने असंतुष्टों को मना कर सक्रिय कर पाते हैं या नहीं। कांग्रेस और भाजपा में एक अंतर है, कांग्रेस के असंतुष्ट पार्टी को ज्यादा प्रभावित कर सकते हैं जबकि भाजपा के असंतुष्ट इक्का-दुक्का मामलों को छोड़कर कहीं भी पार्टी को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं।
      पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा के निवास पर एक बैठक हो चुकी है और 9 अगस्त को फिर असंतुष्ट चल रहे नेता मिलने वाले हैं। भाजपा में असंतोष की वजह कांग्रेस से आ रहे विधायक और उनके समर्थकों के प्रवेश को लेकर है। पहली खेप में आये 22 विधायकों में से 14 मंत्री बन गए और उसके बाद तीन और विधायक आए उनमें से एक को भाजपा की सदस्यता लेते ही निगम अध्यक्ष बना दिया गया। अब पार्टी के सामने इनको फिर से जिताकर विधानसभा में भेजना एक बड़ी चुनौती है। यह चुनौती उस हालत में कुछ और अधिक बढ़ जाएगी जब असंतोष को पार्टी संभाल नहीं पाएगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों को संगठन में भी प्रतिनिधित्व देने की बात सामने आने के बाद उन नेताओं को भी अपने भविष्य को लेकर चिंता में डाल दिया है जिन्हें उम्मीद थी कि मंत्रिमंडल में जगह भले ही ना मिली हो पर निगम मंडलों और संगठन में जगह मिल जाएगी। उनके असहज होने की खबरें सामने आ रही हैं। उपचुनावों में भाजपा को कैसे अच्छी-खासी सफलता मिले इस पर चिंतन करने के बहाने पार्टी के असंतुष्ट नेता अब लामबन्द होने लगे हैं और वास्तव में यह लामबंदी सरकार व संगठन में वरिष्ठ नेताओं की हो रही उपेक्षा को लेकर है। अलग-अलग असंतोष के स्वर फूटने का सिलसिला तो शिवराज मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही प्रारंभ हो गया था लेकिन अब भी दलबदल का जो खेल जारी है और कांग्रेस से विधायक तोड़कर अपने पाले में लाने का प्रयास किया जा रहा है उससे पार्टी के अंदर एक धड़े में असंतोष पनपने लगा है। रघुनंदन शर्मा के निवास पर नाराज नेताओं की मीटिंग हुई जिसमें पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा, दीपक जोशी, युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धीरज पटेरिया, नरेंद्र बिरथरे  शामिल हुए बताए जाते हैं जबकि वीडियो काल से भी कई और नेता उनसे जुड़े और अपनी चिंता एवं पीड़ा व्यक्त की। दीपक जोशी तो पार्टी के अंदर अपनी उपेक्षा को अनेक नेताओं को बता चुके हैं और उन्होंने शुक्रवार को दिल्ली में केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल से भी मुलाकात की है। हो सकता है कि वह कुछ और नेताओं से मिलने का प्रयास करें। पहले शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार में देरी हुई, फिर विभागों के वितरण में खींचातान चली और अभी तक प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा द्वारा अपनी टीम की घोषणा में भी देरी होने को बढ़ते असंतोष का कारण बताया जा रहा है। सत्ता और संगठन के बीच कुछ नामों को लेकर उस समय भी बड़ी मुश्किल से सहमति बनी थी और अब संगठन की कार्यकारिणी घोषित होने में भी इसी कारण देर हो रही है। कांग्रेस से भाजपा में गए चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी, प्रेमचंद गुड्डू अपनी पुरानी पार्टी में आ गए हैं। भाजपा अपने असंतोष को  दबाने की पूरी-पूरी कोशिश कर रही है लेकिन वह कितना काबू कर पाती है यह आने वाले कुछ माह में पता चल सकेगा।
कांग्रेस के सामने भी चुनौतियां नहीं है कम
      पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। अभी भी कांग्रेस के कुछ नेता ट्वीटर सहित अन्य सोशल मीडिया के माध्यमों से कुछ ऐसी बात उछाल देते हैं जिससे उसके बड़े नेता असहज हो जाते हैं। इससे भाजपा को भी निशाना साधने में आसानी रहती है। प्रदेश में कांग्रेस के दो बड़े चेहरे दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ही हैं और इशारों-इशारों में कटाक्ष में जो बात सामने आती हैं उनमें निशाना इनमें से किसी एक पर ही लगा होता है। दिग्विजय सिंह के  अनुज कांग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह अक्सर ऐसी बात कह देते हैं जिसमें कभी-कभार कमलनाथ लेकिन अधिकतर दिग्विजय सिंह निशाने पर होते हैं। कमलनाथ के सामने सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि उनके सांसद बेटे नकुलनाथ ने स्वयं को उपचुनावों में खुद को युवाओं का नेतृत्व करने की भूमिका में लाकर खड़ा कर दिया है। इससे कहीं ना कहीं उन नेताओं और उनके समर्थकों में निराशा आई है जो युवा हैं। उनके मन में नेतृत्व करने की हिलोरें लंबे समय से उठ रही है और वे अपने आपको दावेदार मान रहे हैं। अधिकांश लोग संघर्ष के समय से युवाओं के बीच राजनीति कर रहे हैं वह आसानी से इस बात को हजम नहीं कर पा रहे हैं कि कोई अचानक बिना युवाओं की राजनीति करे स्वयं मैदान में उतर आए। इससे अंदर ही अंदर जो तनाव की स्थिति बन रही है उसे आपसी सामंजस्य और सौहार्द्र में बदलने का काम बखूबी केवल कमलनाथ कर सकते हैं क्योंकि नकुलनाथ उनके बेटे हैं, अन्यथा उपचुनावों में इसका कांग्रेस को कितना खामियाजा भुगतना पड़ेगा आने वाला समय ही बताएगा। प्रेमचंद गुड्डू और बालेंदु शुक्ला के कांग्रेस प्रवेश से असहज स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है लेकिन चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी और डॉ. कन्हैयालाल अग्रवाल के प्रवेश का स्थानीय स्तर पर विरोध हो रहा है। मुरैना जिले में भी कांग्रेस कार्यकर्ता दो क्षेत्रों में क्षेत्र के नेता को टिकट नहीं देने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे चुके हैं। कांग्रेस खेमे की चर्चा है की बात तो सर्वे की की जा रही है लेकिन प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह और अग्रवाल को टिकट देने का मन बना चुके हैं। राकेश सिंह के बारे में स्थिति यह है वे कांग्रेस के सदस्य हैं या नहीं यही स्पष्ट नहीं है। दिग्विजय सिंह, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, पूर्व मंत्री डॉ. गोविंद सिंह, भिंड जिले के कांग्रेस पदाधिकारी राकेश सिंह का विरोध कर रहे हैं। अग्रवाल  का भी गुना जिले में विरोध हो रहा है और इस बात को प्रदेश नेतृत्व तक बता भी दिया है। पूर्व में विधायक और सांसद का चुनाव हारे अनेक कांग्रेस नेता भी अचानक दावेदारी ठोकने लगे हैं और इसने भी कमलनाथ की उलझन बढ़ा दी है। कमलनाथ ने यह कह कर कि टिकट केवल सर्वे के आधार पर दिए जाएंगे, असंतोष को दबाने की कोशिश की है, लेकिन सर्वे से हटकर यदि कुछ चहेतों को टिकट मिल गए तो फिर असंतोष भड़कते देर नहीं लगेगी।
और यह भी...
      पूर्व मंत्री कांग्रेस विधायक उमंग सिंघार ने बकरा ईद के मौके पर ट्वीट करते हुए अपने नेताओं पर ही निशाना साध दिया है। सिंघार ने अपने ट्वीट में लिखा है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक कांग्रेस के अनेक नेताओं, कार्यकर्ताओं एवं नेहरू-गांधी परिवार का कुर्बानी का इतिहास रहा है लेकिन कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए युवा नेतृत्व एवं देश की सबसे पुरानी पार्टी को कुर्बान करने पर तुले हैं। ईद मुबारक। सिंघार ने इसे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और राहुल गांधी को टैग किया है। उनका निशाना किस पर है, इस मामले में यह कहावत चरितार्थ होती है कि ’समझने वाले समझ गए जो ना समझे वो अनाड़ी।’
- अरुण पटेल