मध्यप्रदेश / जनादेश :मतदाताओं के विश्वास से शिवराज के आभा मंडल में आया निखार

      प्रदेश में 28 उपचुनाव की मतगणना में ईवीएम से जो नतीजे निकले हैं उनमें मतदाता के विश्वास से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के आभामंडल में फिर से नया निखार आया है और उनका जादू मतदाताओं के सिर चढ़कर बोल रहा है। कांग्रेस के बिकाऊ और टिकाऊ तथा गद्दार वाले मुद्दे को मतदाताओं ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है। सामाजिक सरोकारों के चलते शिवराज ने मतदाताओं से जो सीधे रिश्ते बनाए थे उसका ही यह कमाल रहा कि कांग्रेस के पुनः सत्ता में आने के अरमान दफन हो गए। कमलनाथ के नेतृत्व में फिर से कांग्रेस सरकार बनने के सपने महज सपने ही रह गए। कांग्रेस को भरोसा था मतदाताओं के मानस में विश्वासघात और उसके मतों को बेचने का आरोप उसे एकतरफा जीत दिला देगा लेकिन हुआ उसके उलट मतदाता ने स्थिरता और शिवराज के वायदों पर भरोसा करते हुए एकतरफा फैसला सुना दिया। कांग्रेस चुनावी लड़ाई को दलबदलू बनाम  जनता बनाने में सफल नहीं हो पाई, कारण है कि कांग्रेस इकाई में ही सिमट कर रह गई और 2 अंकों में पहुंचने के लिए जद्दोजहद करती नजर आई। इससे यह बात साफ होती है कि वह तो कड़ा चुनावी मुकाबला भी नहीं कर पाई। 
      भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के दलबदल के औचित्य पर मतदाताओं ने अपनी सहमति की मोहर लगा दी। यह सिंधिया की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी कि उन्होंने यह साबित कर दिया उनके भरोसे पर जिन मंत्रियों और विधायकों ने  त्यागपत्र दिए थे उनमें से अधिकांश चुनाव जीत गए हैं, पर  उनके कुछ नजदीकी पिछड़ गए  हैं। प्रदेश के राजनीतिक फलक पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव में कमी नहीं आएगी क्योंकि उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि जिन्होंने उनके कहने पर अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर लगाया था वह ना केवल जीत कर विधानसभा में पहुंचे बल्कि अनेक उम्मीदवार बड़े अंतर से जीत दर्ज कराने में सफल रहे हैं। मुरैना जिले में कांग्रेस को अच्छी सफलता मिली है तो उसने ग्वालियर में भी सिंधिया और भाजपा को कुछ झटका दिया है। यह पहलू भी महत्वपूर्ण है कि केवल उम्मीदवारों ने दल ही नहीं बदला बल्कि अपने साथ अपने समर्थक मतदाताओं को भी साथ ले गए। उपचुनावों में सिंधिया के साथ पार्टी में आए नए नेताओं और भाजपा के पुराने कार्यकर्ता और खाटी नेताओं के बीच अच्छा तालमेल बैठा तथा उनके बीच समन्वय बैठाने में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सांसद विष्णु दत्त शर्मा तथा महामंत्री संगठन सुहास भगत के प्रयास रंग लाए और भाजपा ने एकतरफा जीत की इबारत लिख दी। कांग्रेस के वायदों और शिवराज सिंह चौहान की सरकार पर नए व पुराने कार्यकाल के दौरान लगाए गए आरोपों पर वोटरों ने विश्वास नहीं किया वहीं दूसरी ओर भाजपा  के विकास के दावे और आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के संकल्प पर पूरा  विश्वास किया। उपचुनाव आम चुनाव की मानसिकता लिए हुए थे और इसमें मतदाताओं ने दो टूक फैसला कर मतदान बाद की किसी भी प्रकार की सौदेबाजी  और अस्थिरता की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। 2018 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने एक प्रकार से खंडित जनादेश दिया था जिसमें ना तो कांग्रेस को बहुमत आया था और  ना ही भाजपा भी उससे अधिक पीछे थी  बल्कि उसका मत प्रतिशत कांग्रेस से कुछ ज्यादा था। कांग्रेस ने जिन्हें बिकाऊ माना उन्हें मतदाताओं ने टिकाऊ बना दिया। कांग्रेस का चुनाव में सबसे बड़ा अस्त्र बिकाऊ बनाम टिकाऊ था   उसकी धार कांग्रेस ने ही उस समय बोथरी कर ली जब उसने दूसरे दलों से आए 9 नेताओं को अपनी टिकट पर मैदान में उतारा। दूसरे सर्वे के पिटारे से जो उम्मीदवार निकले उनमें से कुछ हवा हवाई थे तथा स्थानीय कांग्रेस नेता यह कहते रहे थे कि सर्वे में जो नाम सामने आए हैं उनसे अच्छे उम्मीदवार उनके पास हैं, पर उनकी बातों पर ध्यान ना देकर सर्वे पर ज्यादा यकीन किया। कांग्रेस ने अपना पूरा ध्यान और फोकस ग्वालियर-चंबल अंचल पर दिया क्योंकि वह  सिंधिया को सबक सिखाना चाहती थी लेकिन वहां भी कुछ खास नहीं कर पाई। यह बात अलग है कि वहां पर उसे कुछ सीटें मिली पर निमाड़ और मालवा के जिस अंचल में कांग्रेस को 2018 के चुनाव में अच्छी खासी सफलता मिली थी वहां  उसकी जमीन पैरों तले से खिसक गई और भाजपा ने अपने खोए हुए जनाधार को वापस पा लिया भले ही इसके लिए उसने कांग्रेस के जीते उम्मीदवारों को अपने पाले में लेकर उनके ही सहारे ऐसा किया हो। ग्वालियर-चंबल में  कांग्रेस ने कुछ सीटें भले जीती हों  लेकिन इसके बदले में उसने मालवा और निमाड़ में अपना बहुत कुछ खो दिया। ग्वालियर और चंबल में अधिक नहीं लेकिन को झटके कांग्रेस ने भी जरूर दिए हैं।
       भाजपा के सभी बड़े नेता शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विष्णु दत्त शर्मा, उमा भारती, प्रह्लाद पटेल, ज्योतिरादित्य सिंधिया , डॉ. नरोत्तम मिश्रा  और अरविंद भदौरिया सहित तमाम बड़े नेता और कार्यकर्ता पूरी लय और ताल के साथ सक्रिय रहे एवं उनका पूरा अभियान योजना  के   अनुसार  चला। इसके विपरीत कांग्रेस में वन मैन शो रहा और अधिकांश दारोमदार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर रहा। कांग्रेस द्वारा सिंधिया परिवार और  ज्योतिरादित्य सिंधिया पर किये गए अति आक्रामक शाब्दिक हमले का मतदाताओं पर  नकारात्मक असर पड़ा, यह स्पष्ट संदेश जनादेश से उभर कर सामने आया है। कांग्रेस ने केवल एक टिकट ब्यावरा में बिना सर्वे के दिया था और वहां उम्मीदवार के चयन का पूरा दारोमदार दिग्विजय सिंह पर सौंप दिया था वहां रामचंद्र दांगी कांग्रेस उम्मीदवार थे और वह अच्छी बढ़त लेकर चुनाव जीतने में सफल रहे। भाजपा की इस शानदार जीत का श्रेय सरकार के मुखिया के नाते शिवराज सिंह चौहान और संगठन मुखिया के नाते विष्णु दत्त शर्मा को जाता है जिसमें दोनों की टीम ने पूरे तालमेल से प्रचार अभियान को अंजाम दिया और बूथ स्टार पर जो मैदानी जमावट की वह काफी पुख्ता थी जबकि कांग्रेस का बूथ मैनेजमेंट उसके मुकाबले लचर साबित हुआ। भाजपा के अंदर जो असंतोष की खबरें आ रही थीं उससे कांग्रेस अधिक उत्साहित थी और चुनाव लड़ने के कांग्रेस और भाजपा के तौर-तरीकों के अंतर को वह बूझ नहीं पाई।   भाजपा में उम्मीदवार नहीं संगठन चुनाव लड़ता है और कांग्रेस में उम्मीदवार की टीम काम करती है, मध्य प्रदेश में भाजपा का मजबूत संगठन है, भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं की मेहनत ने ही इस जीत की इबारत लिखी है। नरेंद्र सिंह तोमर ने रूठे कार्यकर्ताओं को समझाने बुझाने का काम किया और साथ ही रोड- शो एवं सभाएं भी कीं तो वहीं   उमा भारती और प्रहलाद पटेल ने लोधी मतदाताओं को पूरी तरह साध कर भाजपा के साथ लामबंद कर दिया। इससे भाजपा ने इस बड़ी जीत की पटकथा को अंतिम अंजाम तक पहुंचाया।
और अंत में...
       ये 28 उपचुनाव धारणा यानी परसेप्शन के चुनाव थे और इसमें मतदाता को दो-टूक फैसला  करना था, इसमें नतीजे एकतरफा ही आना था। मतदाताओं के मानस में बिकाऊ मुद्दा और उसके वोट बेचने का मुद्दा घर कर जाता तो दूसरे नतीजे आते और उसने इसके उलट स्थिरता और विकास के लिए भाजपा को पसंद किया। उसे शिवराज और कमलनाथ में से किसी एक चेहरे को पसंद करना था तो उसने शिवराज को ही पसंद किया और उनका जो आभामंडल 2018 में  कुछ फीका पड़ गया था उसमें फिर से विश्वास कर निखार दिया। इसके बाद कांग्रेस को पूरी गंभीरता से इस बात का आत्मचिंतन करना चाहिए कहां और किस स्तर पर कमी रह गई जिसके कारण उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा।
अरुण पटेल