क्या कांग्रेस को किसी ‘शरद पवार’ की जरूरत है भी?

कोरोना और ‍किसान आंदोलन के दौर में यह एक ‘राजनीतिक शरारत’ और ‘सियासी मजाक’ भी था। देश के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रवादी कांग्रेस( एनसीपी) सुप्रीमो शरद पवार के 80 वें जन्मदिन के दो दिन पहले खबर उड़ी कि उन्हें अब यूपीए का चेयरपर्सन बनाया जा सकता है। क्योंकि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी काफी थक चुकी हैं। जैसे ही यह खबर चली, समूचे विपक्षी खेमे में हलचल मच गई। हालांकि कांग्रेस और खुद शरद पवार ने ऐसी किसी अटकल को खारिज कर दिया। दूसरा मामला शरद पवार की सालगिरह पर आयोजित जश्न में इस बुजुर्ग मराठा नेता का संबोधन रहा। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताअो को नसीहत दी कि वो ‘कभी भी विचारधारा से समझौता नहीं करें।‘ उधर खबरखोजी तहकीकात में लग गए कि शरद पवार को यूपीए चेयरपर्सन बनाने के सुझाव के पीछे चाल किसकी थी? मकसद क्या था और क्यों यह ‘मूव’ शुरू में ही फेल हो गया? दूसरे, अपने वानप्रस्थ के दौर में शरद पवार ने विचारधारा की बात क्यों की? यह संदेश वास्तव में ‍िकसके लिए था?
यूं शरद पवार 80 के हो चुके हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक मेधा दुरूस्त है। इसका सबसे बढि़या उदाहरण हमने पिछले साल महाराष्ट्र में चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के मुंह से सत्ता का निवाला सफाई से छीनने की पवार शैली की सियासत में देखा। पवार उस शिवसेना को अपने पाले में खींच लाए, जो हिंदूवादी राजनीति में कभी भाजपा के हमसाए की तरह रही और अब दबी जबान से सेक्युलरवादी सियासत का आचमन करने की कोशिश कर रही है। सत्ता का मोह क्या नहीं कराता? साल भर बाद भी शरद पवार का राजनीतिक सुरक्षा चक्र ठाकरे सरकार को बचाए हुए है।
लेकिन पवार को यूपीए चेयरपर्सन बनाने की बात आई कहां से? गहराई में जाएं तो पवार को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का सुझाव सबसे पहले आरपीआई नेता व एनडीए सरकार में मंत्री रामदास आठवले ने इस साल सितंबर में ‍िदया था। आठवले ने एक ट्वीट किया था कि चूंकि सोनिया गांधी और राहुल गांधी कांग्रेस का नेतृत्व करने के इच्छुक नहीं हैं, अत: एनसीपी का कांग्रेस में विलय कर शरद पवार को उसका अध्यक्ष बना दिया जाना चाहिए। आठवले के ट्वीट के दो हफ्ते पहले ही कांग्रेस में 23 असतुंष्ट नेताअोंने पार्टी में आमूल बदलाव की मांग को लेकर अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी।
अब दो माह बाद इस ‘जिन्न’ ने निराकार स्वरूप में सिर उठाया। शरद पवार के जन्मदिन के दो दिन पहले मोदी सरकार समर्थक माने जाने वाले एक न्यूज चैनल ने ‘सूत्र’ के हवाले से खबर चलाई कि राकांपा नेता शरद पवार सोनिया गांधी की जगह यूपीए की कमान संभाल सकते हैं। वेब साइट के मुताबिक यूपीए में सोनिया के विकल्प की तलाश शुरू हो गई है और शरद पवार यह दायित्व निभाने पूरी तरह तैयार हैं। विपक्ष को केंद्र में किसी ऐसे नेता की जरूरत है जो ‘चतुर’ हो और अन्य दलों के नेताअों से भी बातचीत कर सके। इस मामले में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार बड़ा चेहरा हैं। महाराष्ट्र में उन्होंने शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन बनाकर सभी राजनीतिक पंडितों को चौंकाया था। ‘सूत्र’ ने न्यूज चैनल से कहा कि राहुल गांधी फिर कांग्रेस अध्यक्ष बनने तैयार नहीं हैं। कांग्रेस पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुकी है, इसलिए यूपीए अध्यक्ष पद उसे मिलना मुश्किल है, जबकि दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों के नेता और उनकी राजनीतिक पार्टी जैसे ममता बनर्जी की टीएमसी, एम के स्टालिन की डीएमके आदि पार्टियां काफी मजबूत हैं। ये लोग कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी के साथ बातचीत के लिए सहमत नहीं होंगे।  इसलिए किसी ऐसे नेता की दरकार है, जिसके पास राजनीति के गुण हो और जो प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे को टक्कर दे सके। ‘सूत्र’ के मुताबिक शरद पवार में यह काबिलियत है। ‘सूत्र’ ने कहा कि शरद पवार, दोस्तों और दुश्मनों पर हावी रहते हैं।
इस खबर के चलते ही शरद पवार के करीबी प्रफुल्ल पटेल ने इस सुझाव का ‘स्वागत’ ‍करते हुए कहा कि लगता है एनसीपी का अधूरा सपना कि शरद पवार देश के प्रधानमंत्री बनें, अब पूरा होने जा रहा है। इससे एकजुट विपक्ष और ज्यादा प्रभावी होगा। शिवसेना के संजय राउत ने कहा कि 'राजनीति में कुछ भी हो सकता है। पवार में देश का नेतृत्व करने के सारे गुण हैं, उनके पास बहुत अनुभव है, उन्हें देश के मुद्दों का ज्ञान है और वह जनता की नब्ज जानते हैं।‘
उधर न्यूज चैनल की खबर के बाद खुद कांग्रेस में खलबली मच गई। कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने कहा कि यह विपक्ष को बांटने की साजिश है।एनसीपी के मुख्य प्रवक्ता महेश तापसे ने कहा कि यूपीए के सहयोगियों से हमारी कोई चर्चा नहीं हुई है। इस तरह की खबरें किसान आंदोलन से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश है। खुद शरद पवार ने कहा कि इन अटकलों में कोई सच्चाई नहीं है। चैनल को खबर देने वाला यह ‘सूत्र’ कौन था, यह अभी तक साफ नहीं है। क्या इस खबर को चलाने का मकसद केवल विपक्ष के मूड को भांपना था, जिसके विरोध के पास मामले पर लीपापोती कर दी गई।
इस बात में शक नहीं कि शरद पवार राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी हैं। दिग्गज कांग्रेस नेता यशवंतराव चह्वाण के शिष्य रहे शरद पवार पहले कांग्रेस में ही थे। लेकिन पार्टी में पर्याप्त सीनियारिटी और जमीनी पकड़ होने के बाद भी जब उनकी जगह श्रीमती सोनिया गांधी को कांग्रेसअध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तो नाराज पवार ने  1999 में नई पार्टी एनसीपी बना ली। तब पवार ने सोनिया की उम्मीदवारी का यह कहकर विरोध किया था कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कोई विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं हो सकता। बाद में वो खुद ही सोनिया के नेतृत्व वाले यूपीए में शामिल हो गए। वैसे  कांग्रेस से अलग होकर भी पवार बीच के पांच साल छोड़ दें तो कांग्रेस के साथ सत्ता में साझीदार रहे हैं। यानी पवार के पास वो फार्मूला है, जो सत्ता दिलवाता है और उसे कायम भी रखता है।
दूसरी खबर पवार द्वारा कार्यकर्ताओं को ‘विचारधारा पर अडिग’ रहने की नसीहत की थी। इससे यह सवाल भी उठा कि शरद पवार और उनकी पार्टी की विचारधारा आखिर है क्या? गहराई से समझें तो पवार की विचारधारा यही है कि उनकी कोई विचारधारा नहीं है और वो इस पर आज तक ‘अडिग’ हैं। इसका आधार यह कि पवार ने सत्ता पाने किसी भी विचारधारा से समझौता करने में कभी कोताही नहीं की। अपने राजनीतिक जीवन में वो लगभग पूरे समय सत्ता में या सत्ता की धुरी रहे। पवार ने 1978 में ही कांग्रेस को तोड़ जनता पार्टी से हाथ मिलाया और महाराष्ट्र के युवतम मुख्यमंत्री बन गए। 1986 में वो फिर कांग्रेस में लौटे और दो बार सीएम बने। 1999 में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने एनसीपी बनाकर फिर महाराष्ट्र में कांग्रेस से सत्ता साझा की। 2014 में भाजपा शिवसेना गठबंधन के सत्तासीन होने से पहले ‘राज्य हित’ में पवार ने अल्पमत वाली भाजपा सरकार को कुछ दिनों के लिए बाहर से समर्थन दिया। 2019 में वो धुर विरोधी शिवसेना और कांग्रेस के साथ फिर सत्ता में हैं। यानी पवार की विचारधारा वास्तव में सेक्युलरवाद, राष्ट्रवाद,महाराष्ट्रवाद, मराठावाद और सर्व धर्म समभाव का मिला जुला सियासी काढ़ा है, जिसे वो राजनीतिक इम्युनिटी कायम रखने के लिए पीते-पिलाते रहते हैं और सत्तारोधी कोरोना को दूर रखते हैं। माना जा रहा है कि उनकी ताजा ‘नसीहत’ का एक लक्ष्य शिवसेना भी है, जिसने सत्ता के लिए वैचारिक सरेंडर किया।
ऐसे में कांग्रेस पवार का नेतृत्व स्वीकार करे भी तो कैसे? यूं भी कांग्रेस के तरकश में बहुत कम बाण बचे हैं, पवार को सेनापति बनाने का अर्थ होता, पूरे तरकश को ही दान कर देना। अब भाजपा ने सियासत को ट्वेंटी-टवेंटी का गेम बना दिया है, यूपीए चेयरपर्सन के रूप में पवार इसे कितने अोवर के गेम में तब्दील करते, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। दूसरे, पवार की उम्र और सेहत उन्हें शायद ही इसकी इजाजत दे। अलबत्ता शिकारी के जाल से बचना और मौका देखकर उसे ही उलटा देना पवार पाॅलिटिक्स की खूबी है। लेकिन क्या कांग्रेस को किसी चाणक्य की जरूरत है भी ?
अजय बोकिल