भोपाल उत्तर : फातिमा को उम्मीदवार बनाने के पीछे क्या है बीजेपी की रणनीति

भोपाल। राज्य में 28 नवंबर को होने वाले चुनाव के लिए राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है। इस रण को भेदने के लिए सभी दलों ने अपने - अपने पत्ते खोल दिए हैं। लोकतंत्र के इस पर्व में शह और मात का खेल शुरू हो चुका है।
भोपाल उत्तर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने बुज़ुर्ग कांग्रेस नेता एवं विधायक आरिफ अक़ील के मुक़ाबले फातिमा रसूल एहमद सिद्दीक़ी को मैदान में उतारा है। फातिमा भोपाल के दबंग नेता एवं पूर्व मंत्री रसूल अहमद सिद्दीक़ी की सुपुत्री हैं। आरिफ अक़ील यहां से पांच बार के विधायक हैं। भोपाल उत्तर से फातिमा को प्रत्याशी बनाने के पीछे बीजेपी की रणनीति क्या है ? और क्या है इस विधानसभा का इतिहास। 
भोपाल उत्तर की राजनीति को समझने के लिए यहां का राजनीतिक इतिहास जानना ज़रूरी है। मध्यप्रदेश की राजनीति के नख्शे में भोपाल उत्तर विधानसभा क्षेत्र का विशेष महत्व है। 1972 तक यह सीट कम्युनिस्ट पार्टी के क़ब्ज़े में थी। तब यह सीट भोपाल सीट के नाम से जानी जाती थी। 1957,1962,1967 और 1972 में भोपाल सीट से कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार खान शाकिर अली खान लगातार चुनाव जीतकर चार बार विधानसभा पहुंचे थे। खान शाकिर अली खान सभी धर्म और वर्ग के लोगों में बहुत लोकप्रिय थे। उनके शानदार व्यवहार और काम करने के अंदाज़ ने उन्हें एक महान नेता के रूप में पहचान दी थी यही वजह थी कि लोगों ने उन्हेँ "शेर - ए - भोपाल" की उपाधि से नवाज़ा था। उस दौर के लोग बताते हैं कि "शेर - ए - भोपाल" खान शाकिर अली खान जैसा नेता भोपाल में आज तक पैदा नहीं हुआ। 1977 में अस्तित्व में आई भोपाल उत्तर से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में हामिद कुरैशी यहां से (1977 का चुनाव) जीते थे। 1980 और 1985 का चुनाव यहां से रसूल अहमद सिद्दीक़ी ने जीता था। लोग उन्हें प्यार से रसूल भाई - भाई साहब भी कहते थे। रसूल भाई ने भोपाल में साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल क़ायम की थी। रसूल भाई सभी धर्मों - वर्गों के लोगों के साथ सामान्य व्यवहार करते थे। रसूल भाई राजधानी के दबंग नेता थे, वह मोतीलाल वोरा और श्यामाचरण शुक्ल के समय में मंत्री रहे, प्रशासन पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी। तमाम अधिकारी उनका सामना करने से घबराते थे। उनके द्वारा किये गए कामों की वजह से लोग आज भी उन्हें याद करते हैं। 
रसूल भाई उसूलों के बहुत पक्के थे 1990 में कांग्रेस ने उनका टिकट काटकर जब भाजपा से कांग्रेस में आये हसनात सिद्दीक़ी को दे दिया तो उनके समर्थकों ने उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ने की सलाह दी,परंतु रसूल भाई ने यह कहकर चुनाव लड़ने से मना कर दिया कि जिस कांग्रेस पार्टी ने मुझे इस मुक़ाम पर पहुंचाया उससे में बगाबत नहीं कर सकता। 
हसनात सिद्दीक़ी ने 1985 का चुनाव भोपाल दक्षिण से भाजपा के टिकट पर लड़ा था और जीते थे चुनाव जीतने के बाद सीएम अर्जुन सिंह के कहने पर वह भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे और विधानसभा से इस्तीफा भी दे दिया था। सीट खली होने के बाद दक्षिण में उप चुनाव हुआ और यहां से कांग्रेस ने हसनात सिद्दीक़ी को ही अपना उम्मीदवार बनाया। ये उप चुनाव भी हसनात सिद्दीक़ी ने जीता उन्होंने भाजपा प्रत्याशी कैलाश नारायण सारंग को पराजित किया था। प्रदेश के ऊर्जा मंत्री रहे हसनात सिद्दीक़ी अपने सीधे और सरल स्वभाव के कारण राजनीति में फिट नहीं हो सके और बाद में घर बैठ गए थे। 
1990 का विधानसभा चुनाव आरिफ अक़ील ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा था उन्होने भाजपा के रमेश शर्मा गुट्टू भैया को पराजित किया था। कांग्रेस प्रत्याशी हासनात सिद्दीक़ी तीसरे नंबर पर रहे थे और उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गयी थी । 1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने रसूल एहमद सिद्दीक़ी को अपना उम्मीदवार बनाया और आरिफ अक़ील जनता दल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे यहां से बीजेपी ने रमेश शर्मा गुट्टू भइया पर दुबारा दांव खेला। भोपाल उत्तर से पहली बार 1993 में भाजपा जीती और रमेश शर्मा गुट्टू भैया यहां से विधायक चुने गए। इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रसूल एहमद सिद्दीक़ी की ज़मानत ज़ब्त हो गयी थी। जनता दल के आरिफ अक़ील दूसरे स्थान पर रहे थे। 1993 का विधानसभा चुनाव साम्प्रदायिक आधार पर लड़ा गया था। साम्प्रदायिक सौहार्द के अलम्बरदार और उसूलों के पक्के रसूल भाई ने हालात से समझौता नहीं किया और वह शहर के विकास में अहम् भूमिका अदा करने के बाद भी चुनाव हार गए। लोगों पर साम्प्रदायिकता का ऐसा भूत सवार था कि रसूल भाई ने जिन लगभग बारह हज़ार लोगों को सरकारी नौकरी में लगाया था उन लोगों ने भी उन्हें वोट नहीं दिया। 
वर्तमान में आरिफ अक़ील यहां से विधायक हैं, पांच बार के विधायक आरिफ अक़ील यहां से अभी तक छे चुनाव लड़ चुके हैं।1998 से वह कांग्रेस के टिकट पर लगातार चुनाव जीत रहे हैं। इस बार भी कांग्रेस ने उन पर भरोसा जताया है और मैदान में उतारा है। 
पिछले तीन बार के चुनाव नतीजों पर नज़र डालें तो 2003 में यहां से कांग्रेस के आरिफ अक़ील को 71556 और भाजपा के रामेश्वर शर्मा को 63848 वोट मिले थे, आरिफ अक़ील 7708 मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी। इसी तरह से 2008 में कांग्रेस के आरिफ अक़ील को मिले 58267 वोटों के मुक़ाबले बीजीपी के आलोक शर्मा को 54241 वोट मिले थे, मतलब 4027 वोटों के अंतर से कांग्रेस प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के आरिफ अक़ील को मिले 73070 वोटों के मुक़ाबले बीजेपी के आरिफ बैग को 66406 वोट मिले थे। इस तरह 6664 मतों के अंतर से कांग्रेस उम्मीदवार विजयी हुए थे। 
उपरोक्त आंकड़ों से सिद्ध होता है कि बीजेपी को जीत के लिए लगभग सात हज़ार ऐसे वोटों की दरकार है जो पहले कांग्रेस को मिलते रहे हैं। भाजपा को वर्षों से कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले ऐसे उम्मीदवार की ज़रुरत थी जो कांग्रेस के वोटों में सेंध लगा सके। शायद इसी लिए बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों ने बुज़ुर्ग हो चुके आरिफ अक़ील को शिकस्त देने के लिए वरिष्ठ कांग्रेस नेता स्वर्गीय रसूल अहमद सिद्दीक़ी की सुपुत्री फातिमा रसूल अहमद सिद्दीक़ी को भोपाल उत्तर से अपना उम्मीदवार बनाया है। बीजेपी को लगता है कि फातिमा अपने पिता के नाम पर कांग्रेसी वोटों में सेंध लगाने में सफल होंगी। 
अब देखने वाली बात यह है कि भाजपा की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरतीं हैं फातिमा। 
अरशद अली खान