खाली वक्त में सोने के मजे और ऊंघता सरकारी तंत्र...!

गनीमत है कि ये सर्वे कोरोना काल और लाॅक डाउन के पहले का है। हालात तो तब भी बहुत बेहतर नहीं थे, मगर सर्वे की मानें तो खाली वक्त में ‘सुकून से सोने लायक’ तो थे। सर्वे से निष्कर्ष ये निकला कि हममे से ज्यादातर भारतीय खाली वक्त में (कुछ और करने के बजाए) सोना ज्यादा पसंद करते हैं। दावा किया गया कि ‘सबके दाता राम’ थ्योरी में भरोसा करने वाले ज्यादातर भारतीयों के देश में इस तरह का पहला सर्वेक्षण है, जिसमें यह जानने की कोशिश की गई कि हम हिंदुस्तानी आमतौर पर अपना दिन कैसे गुजारते हैं। गांवों और शहरों में लोग किन गतिविधियों पर कितना समय खर्च करते हैं या यूं कहें कि  कैसे टाइम पास करते हैं। यह सर्वे किसी और एजेंसी ने नहीं, बल्कि भारत सरकार के राष्ट्रीय सांख्‍यिकी कार्यालय ने बीते साल 2019 के जनवरी से दिसंबर (यानी पूरे साल) के बीच कराया था। इस उम्मीद के साथ कि सर्वे के नतीजों से सरकार के विभिन्न विभागों और मंत्रालयों को नीति-निर्माण के लिए महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकेगी। यहां नोट करने वाली बात ये कि इस ‘निद्रा सर्वे’ में खुद सरकारी विभागों की ‘नींद’ शामिल नहीं है।
बहरहाल जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक बीते इसे ‘टाइम यूज सर्वे’ नाम दिया गया था। ये सर्वे देश के 5947 गांवों और 3998 शहरी ब्लॉकों के साथ दोनों क्षेत्रों के 1 लाख 38 हजार 799 घरों में किया गया था। केवल अंडमान निकोबार वासियों को इससे दूर रखा गया था। इस सर्वे को दो श्रेणियों में बांटा गया था कि लोग वेतन और बिना वेतन (फोकट) वाले काम को कितना वक्त देते हैं।
सर्वे में उभरी जानकारी के मुताबिक औसतन हर भारतीय अपने खाली समय के 552 मिनट या 9.2 घंटे सोकर बिताता है। इसमें भी अपने ग्रामीण भाई शहरियों से आगे हैं। गांव के मर्दों ने फ्री टाइम में औसतन 554 मिनट सोने में बिताए, जबकि गांव की महिलाएं मर्दों से थोड़ी आगे रही। उन्होंने पुरूषों से कुछ ज्यादा समय यानी कि 557 मिनट नींद ली। अलबत्ता शहरी मर्द उतने खुशनसीब नहीं पाए गए। यहां पुरूषों ने अपने खाली समय में 534 मिनट और महिलाओं ने 552 मिनट सोकर बिताए।
मतलब ये कि शहरी भारतीय अपने ग्रामीण बंधुअों की तुलना में खाली वक्त में कम सो पाते हैं। रोजी-रोटी के तनाव, भाग-दौड़ की ‍िजंदगी और आर्थिक मुश्किलें उन्हें खाली वक्त में भी चैन की नींद लेने से रोकती हैं। तनाव तो गांव की जिंदगी में भी हैं, लेकिन वहां लोग नींद के मामले में ज्यादा ‘स्वावलंबी’ होते हैं। क्योंकि गांवों में जिंदगी घड़ी के कांटों की गुलाम नहीं होती।
समझने की बात यह है कि सर्वे के मूल बिंदु ‘खाली समय’ से तात्पर्य मोटे तौर पर दिन में सोने से है। क्योंकि रात में तो प्राय: सभी सोते हैं (अंगूरी के कदरदान, कोठे के शौकीन या आॅन लाइन चैट एडिक्ट्स को छोड़कर)। वैसे भारतीय परंपरा में दिन में सोना अशुभ माना जाता है। ठीक वैसे ही कि जैसे रात में उल्लू का जागना अमंगल माना जाता है। इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि हम भारतीय रात में तो सोते ही हैं, साथ में दिन में काम के वक्त पर भी नींद का अतिक्रमण मजे से होने देते हैं।
अब सवाल ये कि आखिर लोग दिन में सोते क्यों हैं? क्या वो ऐसा मजबूरी में करते हैं या फिर नींद के मामले में भी उनकी सोच ‘राम नाम की लूट’, वाली है। हम भारतीयों का मन उस दर्शन में रचा- बसा है, जिसमे संत दास मलूका ‘राम को ही सब का दाता’ बता गए हैं। और जब राम ही देने वाला है, किसे, कितना और कब देना है, यह भी डिसाइड करने वाला है तो हमे कुछ करने की क्या जरूरत? और जब काम करने की जरूरत ही न्यून है तो कामकाज के घंटों में एक अदद झपकी ले लेने में बुराई ही क्या है? आखिर सोना और जागना भी उसी ऊपर वाले के तयशुदा टाइम टेबल का अहम हिस्सा है। हालांकि इस बेवक्त सोने के बारे में ‍िचकित्सा विज्ञान का मानना है कि इसके पीछे मनोरोग या अन्य तनाव भी हो सकता है। या तो आपको रात में ठीक से नींद नहीं आती है या फिर अनिद्रा रोग या डिप्रेशन भी कारण हो सकता है। लेकिन बात अगर ‘मेरी मर्जी’ की हो तो मेडिकल साइंस खामोश हो जाता है और समाजशास्त्र एंकरिंग करने लगता है। काम के वक्त सोने का सम्बन्ध ‘अजगर करे न चाकरी’ मानसिकता से भले हो, परंतु व्यवहार में यह उत्पादकता पर विपरीत असर डालता है। सीधी-सी बात है कि अगर काम के टाइम में भी झपकियां ली जाएंगी या खर्राटे भरे जाएंगे तो रिजल्ट क्या होगा?
वैसे एक थ्योरी यह भी है कि यदि काम के बोझ के बीच दो घड़ी झपकी ले ली जाए तो आपका एनर्जी लेवल ऊंचा रहता है। काम की वजह से थकान आती भी है तो थोड़ी देर के लिए आंख लगने से वह भी काफूर हो जाती है, बशर्तें आप झपकी को चैन की नींद में तब्दील न होने दें। पुराने जमाने में लोग रात में जल्दी सो जाते और मुंह अंधेरे ही उठ जाते थे। बाकी दिन में वो सोते थे या नहीं, इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।
यूं कोई कितना सोए, इसकी कोई निश्चित खुराक नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि वे रात में सिर्फ चार घंटे सोते हैं तो पूर्व पीएम पीवी नरसिंहराव के बारे में कहते थे कि वो दिन में भी झपकी लेने का वक्त निकाल लेते थे। किसको कितनी नींद की दरकार है, विशेषज्ञों के मुताबिक यह सम्बन्धित व्यक्ति की शारीरिक और एनर्जी जरूरतों पर निर्भर करता है। कुछ लोग चंद घंटों की नींद के बाद टंच हो जाते हैं तो कई को लंबी ताने बगैर चैन नहीं मिलता। हमारे शास्त्रों में ज्यादा सोना मनुष्य के 6 दुर्गुणों में माना गया है। संस्कृत श्लोक है-षड्दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छिता। निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता। अर्थात ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को नींद, तन्द्रा,, डर, क्रोध ,आलस्य तथा दीर्घसूत्रता ( लेतलाली) इन छ: दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए। लेकिन इस श्लोक में महिलाअों की ‘नींद जरूरतों ‘के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।
यहां चर्चा का मुख्य मुद्दा हम भारतीयों के काम के टाइम में सोने की लत या शौक का है। पहले तो धन्य हैं वो नरनारी, काम-धंधे की जानलेवा चिंताअों के बीच भी जिनकी आंख आराम से लग जाती है। धन्य है वो सर्वे एजेंसी, जिसने भारतीयों को सोने के मामले में ‘रंगे हाथों’ पकड़ा है। वरना आज देश-दुनिया, घर-बाहर के हालात ऐसे नहीं हैं कि वक्त के तप्त थपेड़े मां की लोरी की माफिक महसूस हों। देश में चौतरफा सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्यगत, रोजगार और राजनीतिक संकटों के बीच भी हममे से कई बंधु-भगिनियां आराम से सो पा रहे हैं तो हमे उस परमपिता का धन्यवाद करना चाहिए कि ‍िजसने और इस जमीन पर उसके बंदों ने हमारी नींद उड़ाने के तमाम इंतजाम रखे हैं,बावजूद इसके नींद रात में क्या, दिन में भी सिर उठाने से नहीं चूकती। एनएसअो के इस सरकारी सर्वे से हािसल क्या होगा पता नहीं, क्योंकि हकीकत तो यह है जिस सरकारी तंत्र को आठों प्रहर जागते रहना चाहिए, वह खुद अक्सर कुभंकर्णी नींद से कम ही जाग पाता है। यदि उसका भी ऐसा ही कोई सर्वे भी हुआ होता तो संवेदनशीलता की सबसे खराब सेल्फी शायद उसी की होती। ऐसा नहीं कि यह पूरा तंत्र ही सोता है, लेकिन वक्त पर उसमें चेतना की झंकार कम ही सुनाई देती है। और जब जागता भी है तो ऐसे कि दूसरों की नींद उड़ जाए। किसी शायर ने सटीक कहा है-मुकदमा चला कर मेरी नींद पे तूने, मेरे सारे ख्वाब अपने नाम कर लिए...!
अजय बोकिल